Bhabua News: हंसी-ठिठोली के बीच कजरी, झूमर और ठुमर से गुलजार हुए बधार
Bhabua News: कैमूर में धनरोपनी के दौरान महिलाएं कजरी, झूमर और ठुमर गा रही हैं। सावन की फुहारों में वे आकाश, सूरज और धरती माता की पूजा कर रही हैं। महिलाओं का यह सांस्कृतिक उत्सव गांव के खेतों में प्रेम-नोकझोंक और कृषि श्रम के अनुभवों को व्यक्त करता है।

Bhabua News: शृंगार, सावन की फुहार, दंपती के प्रेम-नोकझोंक, ननद-भौजाई के उलाहने सुना रहीं आकाश, सूरज, धरती, ब्रह्म, इष्ट, डिहवार व अन्य देवताओं का कर रही हैं आह्वान (पेज चार) भभुआ, कार्यालय संवाददाता। कैमूर में धनरोपनी परवान पर है। हर ओर हरियाली की चादर ओढ़े बधार दिख रहे हैं। पेड़ों से लटकते झूला पर युवतियां झूल रही हैं। महिलाएं धनरोपनी में व्यस्त हैं। झूला झुलते और रोपनी करने के दौरान कजरी, झूमर और ठुमर गाये जा रहे हैं, जिससे बधार गुलजार हो रहे हैं। कभी हंसी-ठिठोली तो कभी खिलखिलाती महिलाएं ताना मारती सुनी जा रही हैं। काम करने में मन लगे और तेजी से काम हो इसके लिए महिलाएं गीत गाती हैं। गीत सुनने के लिए लोग खेत के आर-पगार पर खड़े हो जा रहे हैं। राहगीरों के कदम ठिठक जा रहे हैं। धनरोपनी कर रही महिलाएं संयोग और वियोग, सावन की फुहार, पति-पत्नी के प्रेम-नोकझोंक और कृषि श्रम की थकान मिटाने वाले पारंपरिक कजरी गीत गा रही हैं।
महिलाओं की धार्मिक परंपरा
सावन मास की रिमझिम फुहारों और खेत में कीचड़ के बीच काम करते हुए पति, घर-परिवार की खींचतान, सासू-ननद के उलाहने और खेत में पसीना बहाने की व्यवस्था का अनूठा वर्णन वह अपने गीत के माध्यम से कर रही हैं। कृष्ण और राधा के प्रेम तथा वर्षाकालीन उत्सवों से जुड़े प्रसंग सुन लोग मदमस्त हो रहे हैं। पंक्ति की एक महिला गा रही और बाकी पीछे से दोहरा रही हैं। अकोढ़ी के बधार में रोपनी कर रही कबूतरी देवी ने कहा कि धनरोपनी के दौरान कजरी, झूमर और ठुमर गाने की परंपरा काफी पुरानी है। इस दौरान महिलाएं आपस में खूब मनोरंजन करती हैं। बड़गांव खुर्द की दौलातो देवी ने बताया कि धनरोपनी में सबसे पहले देवता की पूजा होती है। इस दौरान आकाश, सूरज, धरती माता, ब्रह्म देवता, इष्ट देवता, समेत अन्य देवताओं का आह्वान गीत के जरिए किया जाता है, ताकि धान की उपज अच्छी हो सकी। आपदा से बची रहे।
गीतों का सामाजिक महत्व
केकर ई तिरियवा केसिया झारे हो रामा... सबार गांव के बधार में गुरुवार को रोपनी करने के दौरान महिलाएं ‘घोड़ा चढ़ल आवले केकर ई भसूरवा ए रामा..., अहो रामा केकर ई तिरियवा केसिया झारे हो राम..., आंखी तोहार फूटहू, जवानी घून लगहू अहो राम अपनी भवाहिया केसिया झारहू हो रामा...’ ऐसे कई तरह के गीत सुहावना लगने और काम में ऊर्जा लाने के लिए गा रही थीं।
गायन की सांस्कृतिक यात्रा
क्यों महिलाएं गाती हैं गीत भभुआ शहर के साहित्यकार डॉ. विवेकानंद तिवारी धनरोनी के समय गाए जाने वाले कजरी, झूमर और ठुमर (ठुमरी) जैसे गीतों को केवल मनोरंजन या समय काटने का माध्यम नहीं मानते, बल्कि इन्हें ग्रामीण संस्कृति, लोक-जीवन के सौंदर्य और श्रम-संस्कृति के जीवंत दस्तावेज बताते हैं। ये गीत किसानों के अटूट उत्साह, प्रकृति के प्रति प्रेम और सामाजिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। प्रकृति के यौवन और सृजन शक्ति के साथ मानवीय भावनाओं का सुंदर संवाद स्थापित करते हैं। महिलाएं अपने सुख-दुख, पारिवारिक रिश्तों की नोंक-झोंक और परदेस गए प्रियतम की याद में उपजी विरह वेदना को सहजता से व्यक्त करती हैं। फोटो- 31 जुलाई भभुआ- 1 कैप्शन- रामपुर प्रखंड के सबार गांव के बधार में शुक्रवार को धान की रोपनी करते समय कजरी गाती महिलाएं।


