बेरोज़गारी की मार में पिसते टेंपो चालक, सड़क ही बनी रोज़गार की आख़िरी उम्मीद

Mar 08, 2026 08:07 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भभुआ
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पेज चार की खबर पेज चार की खबर बेरोज़गारी की मार में पिसते टेंपो चालक, सड़क ही बनी रोज़गार की आख़िरी उम्मीद कर्ज लेकर

बेरोज़गारी की मार में पिसते टेंपो चालक, सड़क ही बनी रोज़गार की आख़िरी उम्मीद

पेज चार की खबर बेरोज़गारी की मार में पिसते टेंपो चालक, सड़क ही बनी रोज़गार की आख़िरी उम्मीद कर्ज लेकर खरीदे टेंपो, दिनभर की मेहनत से चल रहा परिवार दुकानदारों, सवारियों और पुलिस के दबाव में गुजरता हर दिन भभुआ, नगर संवाददाता। शहर की सड़कों पर सवारी के इंतजार में खड़े टेंपो चालक आज बेरोज़गारी की सबसे जीवंत तस्वीर बनकर सामने आ रहे हैं। रोज़ी-रोटी की तलाश में किसी ने घर की जमा पूंजी लगा दी, तो किसी ने कर्ज लेकर टेंपो या ई-रिक्शा खरीदा। पढ़े-लिखे होने के बावजूद जब कहीं नौकरी नहीं मिली, तो मजबूरी में सवारी ढोना ही जीवनयापन का साधन बन गया।

टेंपो चालकों का कहना है कि सुबह से देर शाम तक कड़ी मशक्कत के बाद मुश्किल से 300 से 400 रुपये की आमदनी हो पाती है। इसी सीमित कमाई से बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन और रोज़मर्रा के खर्च पूरे किए जाते हैं। इसके बावजूद हालात आसान नहीं हैं। कभी दुकानदारों की नाराज़गी, कभी सवारियों से बहस और अक्सर पुलिस प्रशासन की सख्ती इन सबका सामना इन्हें हर दिन करना पड़ता है। राम प्रकाश, श्रीधर राम, मुद्रिका प्रसाद और प्रमोद कुमार जैसे टेंपो चालकों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि किसी तरह घर का खर्च निकल जाना ही आज सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि बेरोज़गारी के इस दौर में ईमानदारी से जीवनयापन करना भी संघर्ष बन चुका है। अगर अचानक कोई बड़ा खर्च सामने आ जाए जैसे बीमारी, शादी या बच्चों की पढ़ाई तो कर्ज लेना ही एकमात्र रास्ता बचता है। चालकों का आरोप है कि प्रशासन उन्हें एक जगह खड़े होकर सवारी लेने तक की छूट नहीं देता। कभी डंडे के जोर पर, तो कभी चालान की धमकी देकर उन्हें इधर-उधर खदेड़ दिया जाता है। इससे न केवल उनकी कमाई प्रभावित होती है, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ता है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन उनके लिए तय स्थान और स्पष्ट नियम बना दे, तो वे सम्मानपूर्वक अपना काम कर सकेंगे। टेंपो चालक यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब रोजगार के अन्य साधन उपलब्ध नहीं हैं, तो सड़क पर मेहनत करके परिवार पालने वालों को बार-बार प्रताडि़त क्यों किया जा रहा है। उनका कहना है कि थोड़ी सहानुभूति और व्यवस्थित व्यवस्था मिल जाए, तो अच्छा रहता।

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