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कमाई, दवाई, पढ़ाई, सुनवाई से कुर्सी का कोई वास्ता नहीं

कमाई, दवाई, पढ़ाई, सुनवाई से कुर्सी का कोई वास्ता नहीं

संक्षेप: बहस में नतीजा भले न निकले, सवाल लाख टके का छोड़ते हैं बहस में नतीजा भले न निकले, सवाल लाख टके का छोड़ते हैं

Sat, 1 Nov 2025 08:21 PMNewswrap हिन्दुस्तान, भभुआ
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बहस में नतीजा भले न निकले, सवाल लाख टके का छोड़ते हैं (नुक्कड़ पर चुनाव/दुर्गा चौक) रामगढ़। भावनाथ, मुराहू, बटोही बाबा और डिस्को बाबू की दुर्गा चौक पर बहस जारी है। यह चौकड़ी जब गाल बजाती है तब सुनने के सिवा कोई विकल्प नहीं। यह मंच पर भले ही नजर नहीं आते, पर बेंच के सियासी समीक्षकों में शुमार हैं। यह चाय की चुस्की और पान की गिलौरियों के तलबगार हैं। फिर बहस में नतीजा भले न निकले, पर सवाल लाख टके का छोड़ते हैं। बैठकी जम गई है। विषय है- ताज के दावेदारों की धारदार धनबल गणित व मुद्दों से कटरी कटाने की रणनीति।

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मुराहू ने तर्क पेश किया। कैमूर की हर सीट पर हार-जीत की सियासी गुत्थी उलझी हुई प्रतीत हो रही। अंदर की बात यह है कि इसे सुलझाने के लिए माथापच्ची जारी है। पैसे जुटाए जा रहे हैं। कुछ प्रत्याशी चंदा लहाने के लिए गरीबी का राग गा रहे। जनसंपर्क में रुपयों की माला पहनाने का दौर शुरू है। इसके पीछे 'प्रलोभन सूत्र' को कारगर तरीके से अंजाम देने की सेटिंग चल रही है। सभी प्रत्याशियों की नजर मतदाताओं की कमजोर कड़ी पर टिकी है। भावनाथ बोले- सहमत बानी हुजूर। फिर फटाक से अपना पासा फेंका। वकील बन गए पुराने चेहरे के। कहा, कोई केतनो जतन कर ले लेकिन 'नयका नौ दिन पुरनका सौ दिन' वाली बात हमको भा रही है। बाजी तो वही मारेगा जेकरा पास अनुभव है। डिस्को बाबू से नहीं रहा गया। बोले- पुरनका झुनझुना बजाते रह जाएंगे। नये जमाने के गिल्लू भी धांसू गेम खेलने में माहिर दिख रहे हैं। विरोधी प्रत्याशियों के पसीने छुड़ा रहे। अब बटोही बाबा से सहन नहीं हुआ। बोले, नकली बात क्यों कर रहे हो। असली बात यह है कि ताज उसके सिर होगा, जिसके पास मुद्दा से कटरी कटाने का कौशल होगा। पब्लिक के पंवपूज्जी की आड़ में कुर्सी पर कब्जा जमावे के खेला चालू है। एकदम से आन्हरे हो का। ई फालतू के फिलिंग में काहे पड़े हो। तभी अच्छे श्रोता में शुमार सोमारू टपक पड़े। अरे भइया, जगत में सभी भिखारी है। 'खरीद-बिक्री' कभी भी गायब न होनेवाली महामारी है। वोट की सुपारी ले फील्ड की खाक छान रहे ठेकेदारों की एक ही बोली है। लोकतंत्र की उठ रही डोली है। जंग बड़ी करकस है। कुर्सी गांठ खोलती कहां है। बिना 'पोटली' के डोलती कहां है। 'नमक का दारोगा' नहीं पढ़ी क्या? 'अलोपीदीन' की सीख पल्ले नहीं चढ़ी क्या? अरे स्वर्ग में भी 'लक्ष्मी' का राज है। सियासी कुर्सी छल-कपट का साज है। कब से चुप मुराहू अचानक गरजे। कमाई, दवाई, पढ़ाई, सुनवाई से तो कुर्सी का कोई वास्ता नहीं। फसल डूब गई, कोई मुआवजा नहीं। फसल रौंदी गई, कोई गिला नहीं। हाकिमों की उपरी आमदनी पर नकेल नहीं। जब्बर को जेल नहीं, सीधवा को बेल कराने के पैसे नहीं। आ वोट चाही मोटरी बरोबर। नादान कवि ने तभी पंचम स्वर में कविताई शुरू कर दी - भीतर गाली उपर ताली बहुरुपिया है। जिसका मन, किसी चीज को ना तरसे। दगा का बादल सगा न होवे, सबपे गरजे ना बरसे।