Bhabua News: झूला से सजने लगीं बाग-बागीचों के पेड़ों की टहनियां
Bhabua News: रस्सी नहीं मिलने पर साड़ी व टायर से झूला बना पेड़ से झूल रहे हैं बच्चे झूला झुलते समय बच्चे शोर मचा रहे और युवतियां का रहीं हैं सावन गीत

Bhabua News: रस्सी नहीं मिलने पर साड़ी व टायर से झूला बना पेड़ से झूल रहे हैं बच्चे झूला झुलते समय बच्चे शोर मचा रहे और युवतियां का रहीं हैं सावन गीत (पेज चार) भगवानपुर, एक संवाददाता। सावन का पवित्र महीना शुरू हो गया। चंद दिनों में पचइयां यानी नागपंचमी का तयोहार मनेगा। नागपंचमी पर झूला झुलने की परंपरा रही है। लेकिन, बच्चे उससे पहले ही गांव के बाग-बागीचों के पेड़ों की टहनियां में झूला लगा झूल रहे हैं। बच्चों का समूह नीम, पीपल, पाकड़, आम, बरगद के पेड़ों पर झूला लगा रहा है। इससे गांवों का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय और उत्सवी रंग में रंगने लगा है।
सुबह से शाम तक झूलों पर बच्चों की चहल-पहल और हंसी-खुशी का माहौल देखने को मिल रहा है। भगवानपुर में शुक्रवार को पेड़ की टहनियां में झूला लगाकर कई बच्चों को बारी-बारी से झुलने का आनंद लेते देखा गया। झूला झुलकर बच्चे काफी खुश थे। वह शोर मचा रहे थे। भगवानपुर के आमोद, सरोज, दीपक और संजय ने बताया कि सावन मास में ही तो झूला झुलने का आनंद ले पाते हैं। झूला झुलने के दौरान बच्चियां कजरी भी जा रही थीं। हरियाली से आच्छादित पेड़ों पर लगे रंग-बिरंगे झूले ग्रामीण संस्कृति और लोक परंपराओं की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सावन का महीना प्रकृति, आस्था और लोक संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। वर्षों से चली आ रही झूला झूलने और कजरी गाने की परंपरा आज भी गांवों में जीवंत है। आधुनिक दौर में जहां बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल और टीवी पर बीतता है, वहीं सावन के दौरान झूले उन्हें प्रकृति के करीब लाने का काम करते हैं। इससे बच्चों में आपसी मेल-जोल बढ़ने के साथ-साथ पारंपरिक लोक संस्कृति से भी उनका जुड़ाव मजबूत होता है। मांसपेशियां मजबूत होती हैं चिकित्सक सचिन कुमार बताते हैं कि झूला झुलना सेहत के लिए फायदेमंद है। इसमें जोर लगाना पड़ता है, जिससे मांसपेशियां मजबूत होती हैं। हड्डी को भी मजबूती मिलती है। पैरों के साथ ही पूरे शरीर से ताकत लगानी होती है। इस तरह शरीर का व्यायाम भी हो जाता है। उन्होंने बताया कि इसके अलावा शरीर के अन्य अंगों को भी लाभ मिलता है। ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास होता है भोजपुरी कवि सिपाही पांडेय कहते हैं कि गंवई झूला झुलने में न सिर्फ आनंद मिलता है, बल्कि ध्यान केंद्रीत करने का अभ्यास भी हो जाता है। बचपन में जब भी हमलोग झूला झुलते थे ध्यान रस्सी पर रहता था। रस्सी कस के पकड़ते थे और पैरों पर ध्यान रखते थे। इससे बैलेंस बनाना सीखने का अवसर भी मिलता है। बच्चों की गर्दन में भी मजबूती भी आती है। मनोबल बढ़ता है। सावन माह उमंग से भर देता है भगवानपुर की शारदा कुंवर बताती हैं कि पहले की अपेक्षा झूला झुलनेवाले बच्चों की संख्या में कमी आई है। पहले युवा भी झूला झुलते थे, लेकिन अब नहीं दिखते हैं। किसी के पास समय कहां है। सावित्री देवी ने बताया कि यह माह महिलाओं को उमंग से भर देता है। सावन का महीना शुरू होते ही हरियाली और झूले दिमाग में घूमने लगते हैं। हालांकि अभी बारिश नहीं हो रही है। इसलिए चारों ओर हरियाली नहीं दिख रही है। लेकिन, बारिश होने व धान की रोपनी हो जाने पर ऐसा दृष्य दिखेगा। फोटो- 31 जुलाई भभुआ- 3 कैप्शन- भगवानपुर में शुक्रवार को एक पेड़ में झूला लगाकर झुलती बच्चों की टोली।


