अच्छी बारिश नहीं हुई तो चार-पांच हजार कम हो गया मुनाफा
2024 में पहाड़ी क्षेत्र में मक्का की खेती पर प्रति एकड़ 4940-6200 रुपये का लाभ हुआ था, जबकि 2025 में यह घटकर 940-1200 रुपये रह गया। किसानों ने 1500 एकड़ में मक्का की खेती की, लेकिन समय पर बारिश न होने के कारण आमदनी में कमी आई। जलवायु परिवर्तन के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है।

पहाड़ी क्षेत्र में 2024 में प्रति एकड़ मक्का की खेती पर 4940-6200 रुपया हुआ था लाभ, 2025 में 940-1200 रुपया ही अधौरा के करीब 1200 किसान करते हैं 15 सौ एकड़ में मक्का की खेती कैमूर में पहली बार 12350 एकड़ में मक्का की खेती करने का मिला लक्ष्य वर्ष 2024 में पहाड़ी क्षेत्र में प्रति एकड़ में मक्का की खेती पर खर्च मद राशि बीज 960-1200 रुपया खाद 600-900 रुपया सिंचाई 00-00 रुपया जुताई 1500-1700 रुपया मजदूरी 8000-10000 रुपया कुल 11060-13800 रुपया वर्ष 2025 में पहाड़ी क्षेत्र में प्रति एकड़ में मक्का की खेती पर खर्च मद राशि बीज 960-1200 रुपया खाद 600-900 रुपया सिंचाई 00-00 जुताई 1500-1700 रुपया मजदूरी 4000-5000 रुपया कुल 7060-8800 रुपया वर्ष 2025 बिक्री 8000-10000 रुपया मुनाफा 940-1200 रुपया वर्ष 2024 बिक्री 16000-20000 रुपया मुनाफा 4940-6200 रुपया (पटना का टास्क) अधौरा, एक संवाददाता।
जलवायु परिवर्तन का फसल चक्र पर प्रभाव दिखने लगा है। अधौरा में इसका खास असर पड़ रहा है। यहां सिंचाई की अच्छी सुविधा नहीं होने की वजह से किसान वर्षा के पानी पर निर्भर रहकर खेती करते हैं। बारिश होने पर किसानों के खेत में अच्छी उपज निकल पाती है। वर्ष 2024 में अधौरा प्रखंड के करीब 1200 छोटे-बड़े किसानों ने लगभग 1500 एकड़ में मक्का की खेती की थी। तब उन्होंने प्रति एकड़ 16000-20000 रुपये की उपज बेची थी, जिसमें उन्हें 4940-6200 रुपये का मुनाफा हुआ था। तब खेती पर उनकी कुल लागत खर्च 11060-13800 रुपया आया था। इस वर्ष बारिश अच्छी हुई थी। लेकिन, वर्ष 2025 में समय पर बारिश नहीं होने की वजह से उनकी आमदनी काफी कम हो गई। यह अलग बात है कि उपज कम होने से उसे तोड़ने में मजदूरी पर खर्च कम हुआ था। इस वर्ष किसानों ने प्रति एकड़ मक्का की खेती पर 7060-8800 रुपया खर्च किया था। बाजार में मक्का की बिक्री 8000-10000 रुपये में की और मुनाफा सिर्फ 940-1200 रुपयों का हुआ। जलवायु परिवर्तन की वजह से समय पर बारिश नहीं होने से किसानों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा था। पहाड़ी क्षेत्र के किसान बताते हैं कि उन्हें ऐसी समस्या से अक्सर गुजरना पड़ता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार सिंह बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा कैमूर के किसानों से मक्का, मड़ुआ, बाजरा, ज्वार, सावा, कादो, कांगनी, कोडकी की खेती कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है। वैज्ञानिक खेतों में जाकर बुआई कराते हैं। हेरफेर कर खेती करने से मृदा बांझपन, मृत मृदा और रुग्ण मृदाओं को सुधारने का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विधि है, जिसे सभी किसानों को अपनाना चाहिए। इसकी प्लानिंग करते समय क्षेत्र की जलवायु, भूमि, बाजार की मांग, सिंचाई व यातायात सुविधा पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि अच्छा लाभ मिले। अधौरा प्रखंड के सिकरवार, पिपरा, खामकला, अधौरा, चैनपुरा गांव की 1500 एकड़ भूमि में 1500 किसानों से जलवायु अनुकूल खेती कराई गई थी। बुआई के तुरंत बाद बारिश होने पर बढ़ जाता है खर्च बड़गांव के राजकुमार खरवार, दीघार के राजललन यादव, भूईफोर के लालकेश यादव, डुमरावां के भोरिक सिंह, ताला के लालबिहारी राम ने बताया कि मक्का की बुआई करने के तुरंत बाद अगर बारिश हो गई, तो बीज नहीं अंकुर पाता है। दुबारा जुताई करके बुआई की जाती है। इससे मक्का की खेती पर लागत खर्च बढ़ जाता है। इससे भी उनकी आय कम हो जाती है। जब अच्छी बारिश होती है, तब उपज बेहतर होती है। आढ़तिया लगाते हैं किसानों के परिश्रम के दाम पटपर के कैलाश उरांव और एकडिहवा टोला के रामबचन अगरिया बताते हैं कि वह मक्का की बिक्री के लिए भभुआ, खलियारी, राबर्टसगंज, अधौरा के बाजार में ले जाते हैं। बाजार में उनकी उपज की कीमत आढ़तिया लगाते हैं। लेकिन, किसान 20 रुपया किलो से कम में आढ़तिया को मक्का नहीं देते हैं। पूछने पर कैलाश ने बताया कि उनके खेत से मक्का ले जाने के लिए कोई व्यापारी नहीं आते हैं। इसलिए उन्हें बाजार में ले जाने पर परिवहन खर्च भी खुद करना पड़ता है। एक एकड़ में 8-10 क्विंटल मक्का की उपज बड़गांव खुर्द के किसान योगेंद्र यादव बताते हैं कि एकड़ में 12-15 किलो बीज बोते हैं। अच्छी बारिश होने पर आठ से दस क्विंटल उपज होती है। पूछने पर उन्होंने बताया कि यहां सिर्फ बरसाती मक्का की खेती होती है। इसकी बुआई जून के मध्य से जुलाई के अंत तक की जाती है। मानसून की शुरुआत सबसे अच्छा समय है। बुआई के 90 से 115 दिनों बाद फसल तैयार हो जाती है। जब भुट्टे के दाने सख्त और बालियां भूरी पड़ जाती हैं, तब उसे तोड़ते हैं। हालांकि मैदानी भाग के भी कुछ किसान मक्का की खेती करते हैं। कोट कैमूर जिले में पहली बार 5 हजार हेक्टेयर यानी 12350 एकड़ में मक्का की खेती कराने का लक्ष्य विभाग से प्राप्त हुआ है। मक्का का करीब 100 क्विंटल बीज उपलब्ध होने की उम्मीद है। अभी बीज प्राप्त नहीं हुआ है। विकास कुमार, जिला कृषि पदाधिकारी (अधौरा से उमाशंकर सिंह) फोटो- 13 अप्रैल भभुआ- 2 कैप्शन- अधौरा प्रखंड के एकडिहवा टोला के बधार में लगाई गई मक्का की फसल (फाइल फोटो)।
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