Bhabua News: ‘प्रेमचंद ने समाज के मापदंड को भी बदलने का काम किया’
Bhabua News: भभुआ शहर के सरदार वल्लभ भाई पटेल कॉलेज में प्रेमचंद जयंती पर साहित्य और समाज की वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता, आदिवासी ज्ञान और सामाजिक न्याय पर विचार विमर्श हुआ। कई विद्वानों ने प्रेमचंद के योगदान पर प्रकाश डाला और उनकी रचनाओं की महत्ता को समझाया।

Bhabua News: भभुआ शहर के सरदार वल्लभ भाई पटेल कॉलेज में प्रेमचंद जयंती पर साहित्य और समाज की वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा कहा, प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज को इंसानियत और न्याय की राह दिखा रहा श्रद्धांजलि देकर व्यक्तित्व, कृतित्व और वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की (युवा पेज की लीड खबर) भभुआ, नगर संवाददाता। शहर के सरदार वल्लभभाई पटेल महाविद्यालय में शुक्रवार को प्रेमचंद जयंती समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद को श्रद्धांजलि देने के साथ की गई। साहित्यिक परिचर्चा में वक्ताओं ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व, कृतित्व और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे।
प्रेमचंद के जीवन का परिचय
सत्र संयोजक डॉ. वंशीधर उपाध्याय ने प्रेमचंद के जीवन का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताया कि उनका बचपन का नाम धनपत राय था। अंग्रेजी शासन के दौरान उनकी लेखनी पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वे ‘प्रेमचंद’ नाम से लिखने लगे। बाद में ‘हंस’ पत्रिका के संपादन से उनकी पहचान और मजबूत हुई तथा वह मुंशी प्रेमचंद के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य के साथ समाज के मापदंड को भी बदलने का काम किया और आम आदमी के दुख-दर्द को रचनाओं के केंद्र में रखा। अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ. शंकर प्रसाद शर्मा ने कहा कि आधुनिक युग में हिन्दी और उर्दू साहित्य के उत्थान में प्रेमचंद ने वही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो मध्यकाल में संत कवियों ने निभाई थी। उनका साहित्य भारतीय समाज को नैतिक रूप से पतित होने से बचाने वाला रहा। आज जब समाज उपभोक्तावादी और अवसरवादी मानसिकता से प्रभावित हो रहा है, ऐसे समय में भी प्रेमचंद की रचनाएं इंसानियत, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी की सीख देती हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल अपने समय का चित्रण नहीं करता, बल्कि आज की सामाजिक परिस्थितियों में भी उतनी ही मजबूती से प्रासंगिक दिखाई देता है। ‘पंच परमेश्वर’ सत्य और न्याय के साथ खड़े होने की प्रेरणा मुख्य वक्ता साहित्यकार इंद्रजीत सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य मनुष्य को सत्य के साथ खड़े होने का साहस देता है। ‘पंच परमेश्वर’ कहानी की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जब मनुष्य स्वयं को निरीह पाता है तब वह न्याय के लिए न्यायालय या परमेश्वर की शरण में जाता है। कहानी में पंचायत और पंच के माध्यम से न्याय की इसी भावना को सामने रखा गया है। मनोविज्ञान विभाग के डॉ. नियाज अहमद सिद्दीकी ने प्रेमचंद की रचनाओं में छिपे मनोवैज्ञानिक पक्षों की बारीकियों को सामने रखा। उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. सैय्यद अशहद करीम ने प्रेमचंद को साझी संस्कृति और साझा विरासत का रचनाकार बताया। ‘कफन’ में मरती इंसानियत का सजीव चित्रण डॉ. सैय्यद अशहद करीम ने ‘कफन’ कहानी की चर्चा करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने मनुष्य के भीतर से धीरे-धीरे खत्म होती इंसानियत को बेहद बारीकी से चित्रित किया है। हिन्दी विभागाध्यक्ष ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि वर्तमान नवपूंजीवादी व्यवस्था की कई खामियों को प्रेमचंद ने वर्ष 1936 में ही रेखांकित कर दिया था। अंग्रेजी शासन के दौर की न्याय और पुलिस व्यवस्था की कमियां आज भी किसी न किसी रूप में दिखाई देती हैं। प्रेमचंद ने इन विसंगतियों को अपने साहित्य में प्रभावी ढंग से सामने रखा। उनकी रचनाएं व्यवस्था के साथ-साथ समाज और व्यक्ति के भीतर मौजूद कमजोरियों पर भी सवाल खड़ा करती हैं।
आधुनिक समय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता
एआई के दौर में भी याद रहेगा हामिद का चिमटा डॉ. सीमा सिंह ने ‘ईदगाह’ कहानी के माध्यम से कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में भी हामिद का चिमटा ‘रुस्तमे-हिन्द’ बना रहेगा। इसकी वजह उसमें छिपा त्याग, संवेदना और परिवार के प्रति प्रेम है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. प्रियंका मिश्रा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य ज्ञान का ऐसा मंदिर है, जहां प्रवेश करने के बाद हर बार नई ऊर्जा और नई दृष्टि मिलती है। समारोह में डॉ. अखिलेश नाथ तिवारी, डॉ. अन्नपूर्णा गुप्ता, डॉ. भूपेंद्र शुक्ला, डॉ. मीरा कुमारी, डॉ. केश्वर भारती, डॉ. आनंद प्रकाश, डॉ. अजीत राय, डॉ. संगीता सिंह, इंजीनियर नूतन कुमारी, ओमप्रकाश सिंह, पंकज कुमार समेत अन्य प्राध्यापक, कर्मचारी व छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। फोटो : 31 जुलाई भभुआ-13 कैप्शन : सरदार वल्लभभाई पटेल महाविद्यालय में शुक्रवार को प्रेमचंद जयंती पर पोस्टर का विमोचन करते प्राचार्य डॉ. एसपी शर्मा व अन्य। प्रेमचंद जयंती पर राष्ट्रीय सेमिनार के पोस्टर का विमोचन आईसीएसएसआर प्रायोजित सेमिनार में जल, जंगल, जमीन और आदिवासी ज्ञान पर होगा मंथन भभुआ व अधौरा में जुटेंगे शिक्षाविद और शोधार्थी, 9-10 अक्टूबर को होगा कार्यक्रम (युवा पेज) भभुआ, नगर संवाददाता। प्रेमचंद जयंती पर शुक्रवार को सरदार वल्लभभाई पटेल महाविद्यालय में आईसीएसएसआर, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के पोस्टर का विमोचन किया गया। महाविद्यालय के अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ तथा आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले सेमिनार का आयोजन 9 और 10 अक्टूबर को भभुआ व अधौरा में किया जाएगा। सेमिनार का मुख्य विषय ‘जल-जंगल-जमीन और आदिवासी ज्ञान की अवधारणा: भारतीय ज्ञान परंपरा में समावेश और समकालीन प्रासंगिकता’ रखा गया है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. वंशीधर उपाध्याय ने किया। प्राचार्य डॉ. शंकर प्रसाद शर्मा ने कहा कि आयोजन से शोध और अकादमिक गतिविधियों को नई दिशा मिलेगी। वनवासी सेवा केंद्र अधौरा के अध्यक्ष डॉ. सदानंद राय ने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता और सतत जीवनशैली का महत्वपूर्ण उदाहरण है। सेमिनार की संयोजक डॉ. प्रियंका कुमारी मिश्रा ने बताया कि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से शिक्षाविद, विशेषज्ञ व शोधार्थी शामिल होंगे। वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में ग्रामीण समाज, वंचित वर्ग और सामाजिक न्याय का प्रभावी चित्रण मिलता है। ऐसे में उनकी जयंती पर आदिवासी ज्ञान और भारतीय परंपरा पर राष्ट्रीय विमर्श विशेष रूप से सार्थक है।


