Bhabua News: गुरु-भक्ति, संयम और वैराग्य से मिलता है वास्तविक सुख
Bhabua News: परसिया चातुर्मास महोत्सव में भक्तों को श्रीमद्भागवत कथा सुनाई गई। जीयर स्वामी ने बताया कि केवल भौतिक सुख से संतोष नहीं मिलता है, बल्कि भगवान की भक्ति और आत्मसंयम से शांति प्राप्त होती है। उन्होंने कच, ययाति और पुरु की कहानियों के माध्यम से आदर्श पुत्र धर्म, गुरु-भक्ति, और वैराग्य का महत्व बताया।

Bhabua News: परसिया चातुर्मास महोत्सव में कच, देवयानी, ययाति और पुरु की कथा सुनायी बोले जीयर स्वामी, भोग से नहीं, भगवान की भक्ति व आत्मसंयम से शांति मिलती है (पेज चार) भभुआ, नगर संवाददाता। सदर प्रखंड के परसिया में आयोजित चातुर्मास महोत्सव के दौरान भक्तों को श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराया गया।
कच और देवयानी की कथा
जीयर स्वामी जी महाराज ने श्रद्धालुओं को कच, देवयानी, ययाति और पुरु की कथा सुनाते हुए धर्म, गुरु-भक्ति, इंद्रिय संयम और वैराग्य के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक बनता है, जब वह ज्ञान के साथ मर्यादा, सदाचार और धर्म का पालन करता है। केवल भौतिक सुखों के पीछे भागने से जीवन में संतोष नहीं मिलता, बल्कि भगवान की भक्ति और आत्मसंयम से ही वास्तविक शांति प्राप्त होती है। स्वामी जी ने बताया कि देवताओं और असुरों के संघर्ष के समय कच को संजीवनी विद्या सीखने के लिए असुराचार्य शुक्राचार्य के पास भेजा गया था। कच ने कठिन तपस्या और गुरु सेवा के बल पर विद्या प्राप्त की। शिक्षा पूर्ण होने पर जब देवयानी ने विवाह का प्रस्ताव रखा तो कच ने गुरु-पुत्री को बहन के समान मानते हुए उसे अस्वीकार कर दिया। इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि गुरु, गुरु-पत्नी, गुरु-पुत्र और गुरु-पुत्री सभी सम्मान के पात्र होते हैं, जिसने जीवन में ज्ञान का एक अक्षर भी दिया हो, उसके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।
ययाति और पुरु की कथा
प्रवचन में स्वामी जी ने देवयानी और राजा ययाति की कथा का भी वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब शुक्राचार्य के शाप से ययाति समय से पहले वृद्ध हो गए तो उन्होंने अपने पुत्रों से युवावस्था देने का आग्रह किया। अधिकांश पुत्रों ने इसे अस्वीकार कर दिया, लेकिन सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए अपनी युवावस्था सौंप दी। स्वामी जी ने कहा कि पुरु का त्याग भारतीय संस्कृति में आदर्श पुत्र धर्म का सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसने अपने सुख से अधिक पिता की सेवा और सम्मान को महत्व दिया।
वैराग्य का महत्व
स्वामी जी ने कहा कि ययाति ने लंबे समय तक भोग-विलास का अनुभव करने के बाद यह जाना कि इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। जैसे अग्नि में घी डालने से उसकी ज्वाला और बढ़ती है, वैसे ही भोग से वासनाएं शांत नहीं होतीं। इस सत्य को समझकर ययाति के भीतर वैराग्य जागृत हुआ और उन्होंने भगवान की आराधना का मार्ग अपनाया। स्वामी जी ने कहा कि इंद्रियों पर नियंत्रण, सत्संग, धर्मपालन और भगवद्भक्ति ही मनुष्य को परम कल्याण की ओर ले जाते हैं। जो व्यक्ति सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठकर भगवान की शरण ग्रहण करता है, वही वास्तविक सुख और शांति प्राप्त करता है। फोटो- 11 सितंबर भभुआ- 8 कैप्शन- भभुआ प्रखंड के परसिया में आयोजित चातुर्मास महोत्सव में श्रीमद्भागवत कथा के बाद श्रीमन नारायण की आरती करते श्री लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज।


