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19 नबम्बर, 2019|1:06|IST

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समस्याएं रखी तो समाधान के सुझाव भी दिए

शहर ही नहीं गांव में भी लोकसभा चुनाव को लेकर शुरू हुई चर्चा

समस्याओं पर चर्चा करते हुए इसके समाधान की भी रख रहे हैं बात

भभुआ/अधौरा। हिन्दुस्तान टीम

पूरे दिन खेतों व अन्य कामों को निपटाने के बाद जब किसान-मजदूर व ग्रामीण घर लौटते हैं तो सामान्य तौर पर खा-पीकर आराम करते हैं। लेकिन, इन दिनों वह शाम के वक्त गांव की चौपाल में पहुंचकर चुनावी चर्चा में जुट जा रहे हैं। शहर की चाय-नाश्ते की दुकानों पर भी इस तरह के दृश्य दिख रहे है। चौपाल सिर्फ नेता और राजनैतिक दलों पर ही नहीं गांव व शहर की समस्याओं पर भी चर्चा हो रही हे। लगे हाथ लोग इसके समाधान का भी सुझाव देने में पीछे नहीं रह रहे हैं। जब चर्चा शुरू हो रही है स्थानीय क्षेत्र से चुनाव लड़नेवाले नेताओं से लेकर सरकार और उसके मुखिया के कामकाज तक पहुंच जा रही है।

अधौरा चौक पर मंगलवार की शाम काफी संख्या में ग्रामीण बैठे हैं। चर्चा पानी की किल्लत से शुरू हुई और नेताओं व सरकार के कामकाज तथा इसके समाधान की बात से खत्म हुई। अनिल ठाकुर ने कहा कि हर साल गर्मी में उन्हें पानी की समस्या से जूझना पड़ता है। जलस्तर खिसक जाने से स्नान करने, कपड़ा व बर्तन धोने, मवेशियों को पिलाने और खुद पीने में परेशानी होती है। इस बात पर सुखाड़ी उरांव ने कहा कि बिजली की समस्या का तो सौर ऊर्जा सिस्टम ने कुछ हद तक दूर किया है, लेकिन जल संरक्षण का उपाय किए बिना समस्या का समाधान मुश्किल दिखता है। क्योंकि वह पहाड़ी के उपर बसे हैं।

चर्चा में भाग लेते हुए युवा रामेश्वर यादव ने कहा कि डिजिटल युग है। लेकिन, नक्सल प्रभावित इस अधौरा का हाल यह है कि यहां नेट ही काम नहीं करता है। फोन पर बात करते वक्त कॉल ड्रॉप की समस्या भी पुरानी है। जब बात करनी होती है या व्हाट्सएप से कुछ किसी को कुछ शेयर करना होता है तो यूपी के नेटवर्क क्षेत्र में जाना पड़ता है। ऐसे में बैंकों व अन्य प्रतिष्ठानों में ऑनलाइन लेनदेन कैसे संभव है? यहां सिर्फ बीएसएनएल की सेवा है। वह भी फेल रह रही है। शिक्षा के हाल पर चिंता उरांव ने कहा कि अधिकांश स्कूलों के शिक्षक जिला मुख्यालय या अपने घर पर रहते हैं। कौन शिक्षक किस दिन स्कूल में ड्यूटी करेंगे टीचर आपस में ही तय कर लेते हैं। ऐसे में हमारे बच्चों की पढ़ाई गुणवत्तापूर्ण कैसे होगी?

बहादूर खरवार ने कहा कि डीएम तो प्रयास कर रहे हैं। लेकिन, वह तो रोज यहां के स्कूलों को देखने नहीं न आएंगे। कई कनिष्ठ अधिकारी भी प्रखंड मुख्यालय में नहीं रहते हैं। रोहित सिंह ने कहा कि पिछले महीने जब दुर्घटना हुई तो रात में बीडीओ व पीएचसी के प्रभारी भभुआ में ही थे। अगर यह घटना स्थानीय लोगों के साथ होती और इलाज के लिए अस्पताल में हंगामा किया जाता, तब हंगामा करनेवालों को कौन संभालता? इमरान अंसारी, जोखन सिंह, रमेश उरांव आदि ने भी अपनी बातें रखीं।

फोटो- 03 अप्रैल भभुआ- 12

कैप्शन- नक्सल प्रभावित अधौरा चौक पर मंगलवार की शाम लोकसभा चुनाव व मुद्दों पर चर्चा करते ग्रामीण।

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