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‘डॉग्स गैंग के आतंक से सहमे लोग

अवारा कुत्तों से निजात दिलाने के दायित्व को पूरा नहीं कर रही नप

न अवारा कुत्तों की नसबंदी हो रही है न उन्हें ठिकाना लगाया जा रहा

04 दिनों से सदर अस्पताल में नहीं है एंटी रैबीज

50 हजार से भी अधिक आबादी निवास करती है शहर में

तीन माह में इतने लोगों को कुत्तों ने काटा

माह पीड़ित

मई 443

अप्रैल 729

मार्च 911

फरवरी 286

(स्रोत सदर अस्पताल)

भभुआ। कार्यालय संवाददाता

‘डॉग्स गैंग के आतंक से शहरवासी ही नहीं ग्रामीण भी खौफ में हैं। बच्चे व बूढ़े तो खासकर। कुत्तों के झुंड को ‘डॉग्स गैंग इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि वे समूह में आते हैं और किसी पर हमला कर लहूलुहान कर देते हैं या फिर किसी की जान ले लेते हैं। कैमूर में हर रोज अवारा कुत्ते किसी न किसी को अपना शिकार बना रहे हैं। सिर्फ सदर अस्पताल के आंकड़ों पर नजर डाले तो पता चल जाएगा कि यहां कि अवारा कुत्ते कितने खौफनाक हो गए हैं। अनुमंडल, रेफरल, पीएचसी में भी कुत्ता के काटने के बाद लोग एंटी रैबीज इंजेक्शन लेने आते हैं। लेकिन, फिलहाल सरकारी अस्पताल में एंटी रैबीज इंजेक्शन नहीं है। मरीज बाजार की दुकानों से महंगे दाम पर सूई ले रहे हैं।

सदर अस्पताल में 27 मई से एंटी रैबीज नहीं है। इस माह की 26 तारीख तक 443 लोगों ने एंटी रैबीज इंजेक्शन लगवाया है। अप्रैल माह में इससे ज्यादा 729 मरीजों ने इंजेक्शन लगवाया था। हालांकि मार्च में सबसे ज्यादा 911 मरीज सदर अस्पताल पहुंचे और एंटी रैबीज सूई लिए। लेकिन, फरवरी माह में सिर्फ 286 मरीज ही इंजेक्शन लेने पहुंचे थे, जिन्हें दिया गया। जनवरी माह में भी एंटी रैबीज इंजेक्शन की किल्लत हुई थी। जनवरी में सिर्फ एक व दो तारीख तथा 26 से 31 तक इंजेक्शन लगे थे।

कुत्तों के काटने से होनेवाली मौत की तुलना में रैबीज से बचाव के लिए टीकाकरण और नसबंदी किए हुए कुत्तों की संख्या बहुत कम है। घरों में पाले जानेवाले कुत्तों का ही टीकाकरण कराया जाता है। बचाव के उपायों के प्रति जनचेतना का अभाव, अपर्याप्त कुत्ता टीकाकरण तथा कुत्ते के काटने के बाद रोगी की देखभाल में कमी, स्वास्थ्य केन्द्रों में एंटी रैबीज इंजेक्शन की कमी के कारण यहां यह समस्या गंभीर रूप धारण कर गई है। कुत्तों की नसबंदी के लिए प्रयास ही नहीं किए गए हैं। अगर इस उपाय को अपनाया जाए, तो कुत्तों की संख्या नियंत्रित होगी और खतरनाक व पागल कुत्ते कम हो जाएंगे। लोगों का कहना है कि यदि आवारा कुत्तों की समस्या इसी प्रकार बढ़ती रही, तब तो एक दिन लोगों का घर से निकलना भी मुश्किल हो जाएगा।

जिम्मेदारी और प्रावधान

कुत्तों के भय से लोग रात में राह तय करने से कतराने लगे हैं। बच्चों को शाम ढलने के बाद घर से निकलने नहीं दिया जाता है। अन्य लोग हाथ में डंडा लेकर निकलते हैं। जानकार बताते हैं कि अवारा कुत्तों को शहर से पकड़कर ठिकाना लगाने की जिम्मेदारी नगर परिषद की है। पशुपालन विभाग से कुत्तों की नसबंदी कराई जाती है। वन विभाग से सामंजस्य स्थापित कर पागल व खतरनाक बन चुके कुत्तों को जंगलों में छोड़ने का प्रावधान है। लेकिन, इस दिशा में पहल नहीं हो रही है।

क्या कहते हैं शहरवासी

शहर के अंबिका राम, रामचंद्र सिंह ने बताया कि शहर की कोई ऐसी गलियां या सड़क नहीं हैं, जहां अवारा कुत्तों की फौज नहीं होती। सुरक्षा की दृष्टि से कुत्तों को पाला जाता था। गलियों के कुत्तों को दो रोटियां खिलाई जाती थी, ताकि वह पहरेदारी कर सके। लेकिन, अब तो वे आतंक का पर्याय बन चुके हैं। रात के समय बच्चे गलियों में निकलने में डरते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं वे उन्हें काट न लें। अधिकांश शहरवासियों को यह पता ही नहीं है आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण कराने व खतरनाक कुत्तों को पकड़कर जंगल में छोड़ने का प्रावधान है।

क्या कहते हैं चिकित्सक

डॉ. सचिन कुमार बताते हैं कि आवारा कुत्ते विभिन्न बीमारियों के वाहक होते हैं और उनके काटने पर तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है। रैबीज के ज्यादा केस आवारा कुत्तों के काटने से ही होते हैं। यदि इसका वायरस व्यक्ति की केंद्रीय स्नायु प्रणाली में प्रवेश कर जाए, तो इससे पैदा संक्रमण लगभग असाध्य हो जाता है। सही ढंग से इलाज न कराने पर तो काटने के कई वर्ष बाद भी इसके विषाणु पीड़ित व्यक्ति को शिकार बना सकते हैं।

क्या कहते हैं नप सभापति

नगर परिषद के सभापति जैनेन्द्र कुमार आर्य ने बताया कि हमारे पास आवारा कुत्तों को पकड़कर रखने की जगह नहीं है। इन्हें ठिकाना लगाने के लिए वन विभाग को पत्र लिखा जाएगा।

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