कैमूर के किसान रसायनमुक्त व पशुधन आधारित खेती करेंगे
कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र ने कैमूर जिले में प्राकृतिक खेती के लिए जागरूकता अभियान शुरू किया है। यह अभियान 30 जून तक चलेगा, जिसमें किसान संवाद, प्रशिक्षण और प्राकृतिक खेती के लाभों के बारे में जानकारी दी जाएगी। प्राकृतिक खेती से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और किसानों की आमदनी दोगुना हो सकती है।

कृषि विभाग, आत्मा, कृषि विज्ञान केंद्र ने जिले में शुरू किया जागरूकता अभियान, गांवों में जाकर किसानों को कर रहे प्रेरित प्राकृतिक खेती में रासायनिक और जैविक खाद का उपयोग नहीं किया जाता है प्राकृतिक खेती कराने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र करेगा किसानों को प्रशिक्षित (पेज चार की लीड खबर) भभुआ, कार्यालय संवाददाता। कैमूर के किसान रसायनमुक्त और पशुधन आधारित खेती करेंगे। इसके लिए कृषि विभाग, आत्मा, कृषि विज्ञान केंद्र ने जिले में जागरूकता अभियान शुरू किया है, जो जिले की 146 पंचायतों में 30 जून तक चलेगा। इस दौरान अधिकारी और वैज्ञानिक किसान संवाद जागरूकता कार्यक्रम, खेती प्रदर्शन, पंचायत स्तर पर बैठक, संतुलित पोषक प्रबंधन, वैकल्पिक उर्वरक के उपयोग एवं प्राकृतिक खेती का व्यापक प्रचार-प्रसार करेंगे।
प्राकृतिक खेती के फायदे
प्राकृतिक खेती करनेवाले किसानों को कृषि कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक प्रशिक्षित करेंगे। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार सिंह ने बताया कि प्राकृतिक खेती करने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलता है, जिससे किसानों की आमदनी दोगुना हो सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र भी हल्दी, मक्का, सूरन, सब्जी आदि की प्राकृतिक खेती करता है, जहां पहुंचकर किसान ऐसी खेती करने का गुर सीखते हैं। इस तरह की खेती में भूमि प्रथाओं के प्रबंधन, मिट्टी व पौधों में वातावरण से कार्बन को अवशोषित करने की क्षमता होती है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण केंर्दारान किसानों को उनकी उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और आजीविका में सुधार के लिए कृषि संबंधी तकनीक एवं कौशल ज्ञान प्रदान किया जाएगा। प्राकृतिक खेती के लिए मिट्टी में न तो रासायनिक और न ही जैविक खाद डाली जाती है। मिट्टी की सतह पर ही रोगाणुओं और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन को प्रोत्साहित किया जाता है। इससे धीरे-धीरे मिट्टी में पोषक तत्त्वों की वृद्धि होती है। प्राकृतिक खेती में न जुताई होती है और न मिट्टी को पलटा जाता है। प्राकृतिक खेती का आशय पद्धति, प्रथाओं और उपज में वृद्धि संबंधी प्राकृतिक विज्ञान से है, ताकि कम साधनों में अधिक उत्पादन किया जा सके।
कृषि वैज्ञानिकों की टीम
कृषि वैज्ञानिक की टीम गठित कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख डॉ. सदानंद राय ने कृषि वैज्ञानिकों की टीम गठित की है। केंद्र प्रमुख और पूर्व जिला पार्षद डोमा खरवार द्वारा उद्घाटन करने के बाद कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार, डॉ. मनीष कुमार, संजय कुमार द्वारा मंगलवार को सिकरवार में खेत बचाओ अभियान के तहत मिट्टी का स्वास्थ्य, प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, मोटा अनाज, दलहन, तेलहन आदि की खेती एवं कम उर्वरक का प्रयोग करने के लिए किसानों को प्रशिक्षित किया गया। बेहतर स्वास्थ्य को सुनिश्चित करना कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमीत के अनुसार, प्राकृतिक खेती में किसी भी सिंथेटिक रसायन का उपयोग नहीं किया जाता है। इसलिए स्वास्थ्य जोखिम और खतरे समाप्त हो जाते हैं। साथ ही भोजन में उच्च पोषक तत्त्व होने से यह बेहतर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है। जल की कम खपत विभिन्न फसलों के साथ प्रतिकिया करके यह एक-दूसरे की मदद करते हैं और वाष्पीकरण के माध्यम से अनावश्यक जल के नुकसान को रोकने के लिए मिट्टी को कवर करते हैं। प्राकृतिक खेती प्रति बूंद फसल की मात्रा को अनुकूलित करती है।
मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण
मृदा स्वास्थ्य को पुनर्जीवित करना प्राकृतिक खेती का सबसे तात्कालिक प्रभाव मिट्टी के जीवbiology-रोगाणुओं और अन्य जीवित जीवों जैसे- केंचुओं पर पड़ता है। मृदा स्वास्थ्य पूरी तरह से उसमें रहने वाले जीवों पर निर्भर करता है। पर्यावरण संरक्षण यह बेहतर मृदा जीव विज्ञान, बेहतर कृषि जैव विविधता और बहुत छोटे कार्बन एवं नाइट्रोजन पदचिह्नों के साथ जल का अधिक न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित करती है।
पशुधन स्थिरता
कृषि प्रणाली में पशुधन का एकीकरण प्राकृतिक खेती में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्चक्रण में मदद करता है। जीवामृत तथा बीजामृत जैसे इको-फ्रेंडली बायो-इनपुट गाय के गोबर व मूत्र एवं अन्य प्राकृतिक उत्पादों से तैयार किये जाते हैं। कोट कैमूर में पहली जून से खेत बचाओ अभियान शुरू किया गया है। आत्मा, कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र मिलकर किसानों को प्राकृतिक खेती करने के लिए जागरूक किया जा रहा है। यह अभियान 30 जून तक चलेगा। विकास कुमार, जिला कृषि पदाधिकारी फोटो- 02 जून भभुआ- 2 कैप्शन- अधौरा प्रखंड के सिकरवार में मंगलवार को प्राकृतिक व नई तकनीक से खेती करने के लिए किसानों को जानकारी देते कृषि वैज्ञानिक।
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