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विशेष इबादत करने का खास दिन है शब-ए-बरात

खोदावंदपुर, निज प्रतिनिधि। कमरी कैलेंडर वर्ष के आठवें महीने शाबान के चौदहवीं और पन्द्रहवीं तारीख के बीच मनाया जाने वाला तथा इस मौके पर इबादत के माध्यम से खुदा की खुश्नुदी हासिल करने का अवसर शब-ए-बरात...

विशेष इबादत करने का खास दिन है शब-ए-बरात
हिन्दुस्तान टीम,बेगुसरायSat, 24 Feb 2024 08:15 PM
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खोदावंदपुर, निज प्रतिनिधि। कमरी कैलेंडर वर्ष के आठवें महीने शाबान के चौदहवीं और पन्द्रहवीं तारीख के बीच मनाया जाने वाला तथा इस मौके पर इबादत के माध्यम से खुदा की खुश्नुदी हासिल करने का अवसर शब-ए-बरात है। शब-ए-बरात अल्लाह की तरफ से दुनिया वालों पर एक इनाम है। यह कोई त्योहार या कोई रस्म नहीं है जिसको मनाया जाये या मुबारकबाद दी जाए, बल्कि यह तो विशेष इबादत करने का एक खास दिन है, जिसमें इबादत के माध्यम से गुनाहों से मग़फ़िरत और जहन्नुम की आग से पनाह मांगने की कोशिश की जाती है। यह बात नुरूल्लाहपुर जामा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद मोइनुद्दीन साहब ने अपनी नूरानी तकरीर के दौरान कही। लेकिन मुसलमानों में इस रात को लेकर बहुत सारी कुरीतियों ने जन्म ले लिया है जो अल्लाह से और इबादत से दूर करने वाली हैं। ऐसी तमाम बातों से बचना ज़रूरी है।

इमाम साहब ने बताया कि रमज़ान से पहले वाले महीने शाबान की पन्द्रहवीं तारीख की रात को शब-ए-बरात कहा जाता है। शब-ए-बरात का मतलब है कि अल्लाह इस रात में अपने बंदों को जहन्नुम यानी नरक से आज़ाद करते हैं। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि 15 वीं शाबान की मखसूस रात में अल्लाह अपने सभी बंदों की तरफ मुतवज्जह (आकर्षित) होते हैं और अपनी सारी मख़लूक़ को माफ कर देते हैं। सिवाय मुशरिक और दिल में किसी के लिये किना (बैर) रखने वाले लोगों को छोड़कर। फ़ज़ीलत वाली इस रात में तमाम बंदों को चाहिए कि वे अल्लाह की तरफ ज़्यादा से ज़्यादा मुतवज्जह होकर इबादत करते हुए अपने गुनाहों से तौबा करें। इस रात ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त अल्लाह की इबादत में गुज़ारना चाहिए, चाहे इकठ्ठा होकर ज़िक्र अज़कार किया जाये या अकेले करें बस इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि ये रहमत और मग़फ़िरत वाली रात दुनियादारी की बातों में हाथ से न निकल जाये।

क़ब्रिस्तान जाने का क्या हुक्म है!

शब-ए-बरात में क़ब्रिस्तान जाने का विशेष आयोजन किया जाता है और कई जगहों पर देखने में आया है कि वहां दीप जलाये जाते हैं। मोमबत्तियां और अगरबत्तियाँ जलाई जाती हैं। इस बारे में मुसलमानों को एक बात का ख़ास ध्यान रखना चाहिए कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम अपनी पूरी ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार पन्द्रह शाबान की रात यानी शब-ए-बरात को क़ब्रिस्तान गए थे और वो भी बिल्कुल चुपके से। इसलिए मुसलमानों को क़ब्रिस्तान में मेले ठेले लगाने और मोमबत्ती-अगरबत्ती जलाने से बचना चाहिए।

इस मुबारक और फ़ज़ीलत वाली रात में हुड़दंगबाज़ी करना या आतिशबाजी करने से इबादत करने वालों की इबादत में खलल पड़ती है और खलल डालने वाले गुनहगार होंगे। लोगों को अपना कीमती वक़्त मस्जिद या अपने घर में बैठकर इबादत में गुज़ारना चाहिए, क्योंकि पता नहीं यह शब-ए-बरात किसकी ज़िन्दगी का आखिरी शब-ए-बरात साबित हो।

इस रात में किन-किन कामों को करना चाहिए

इस मग़फ़िरत वाली रात में मुसलमानों को अपनी एक-एक घड़ी का हिसाब रखते हुए ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करनी चाहिए। नफिल नमाज़ पढ़ी जाये, तस्बीह पढ़ी जाए, अल्लाह का ज़िक्र किया जाये, क़ुरआन पाक की तिलावत की जाये, इस प्रकार से अपनी रात को गुज़ारना चाहिए कि अल्लाह की खुश्नुदी हासिल हो सके और मग़फ़िरत व जहन्नुम से छुटकारे के लिये की गई दुआ कबूल हो सके।

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