
मौसम की मार: फसलों को बचाने के लिए करें उचित देखभाल
अरहर की फसल में फल मक्खी कीट की निगरानी करेंकीट से बचाव के लिए कृषि वैज्ञानिकों से परामर्श ले करें छिड़काव खोदावंदपुर, निज प्रतिनिधि। मौसम की मार से फ
खोदावंदपुर, निज प्रतिनिधि। मौसम की मार से फसलों को बचाने के लिए उचित देखभाल करें। शीतलहर से बढे ठंड की मार का असर गेहूं, आलू, मसूर सहित अन्य दलहन फसलों पर पड़ने से उपज प्रभावित होने की संभावना है। कृषि विज्ञान केन्द्र खोदावंदपुर के वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान डॉ. रामपाल ने बताया कि इस मौसम में फसलों पर पाला से नुकसान होने की संभावना है। आलू तथा दलहन की फसल के पछेती झुलसा रोग की चपेट में आने की संभावना है। अत्यधिक ठंड के कारण गेहूं की उपज पर कुप्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि गेहूं को पाला के प्रकोप से बचाव के लिए पटवन आवश्यक है।
वहीं, पिछात बोई गई गेहूं की फसल में खरपतवार नियंत्रण के कार्य को प्राथमिकता दें। गेहूं की फसल में जिंक की कमी के लक्षण से पौधों का रंग हल्का पीला दिखाई दे तो ढाई किलोग्राम जिंक सल्फेट 1.25 किलोग्राम बुझा हुआ चूना एवं 12.5 किलोग्राम यूरिया को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिन के अंतराल पर मौसम साफ रहने पर छिड़काव करें। अरहर की फसल में फल मक्खी कीट की निगरानी करें। इस कीट के मैगट सर्वप्रथम अरहर के पौधे के तने में छेद करके उसे खाते हैं। इस वजह से पौधे के तने एवं शाखाएं सूखने लगती हैं। बाद में दाना आने पर बीजों को खाते हैं। जिन स्थानों पर मैगट खाते हैं, वहां कवक एवं जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं। फलस्वरुप ऐसे दाने खाने योग्य नहीं रह जाते हैं और उपज में काफी कमी आती है। इस कीट से बचाव के लिए करताप हाइड्रोक्लोराइड दवा डेढ मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल कर छिड़काव करें। मटर की फसल में चुर्निल फ़फ़ून्दी रोग की निगरानी करें इस रोग में पत्तियों फलों एवं तने पर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ती हैं। इस रोग से बचाव के लिए फसल में कैराथेन दवा का एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी अथवा सल्फैक्स दवा का तीन ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। मटर में नियमित रूप से फली छेदक कीट की निगरानी करें। विलंब से बोई गई दलहनी फसल में 2% यूरिया के घोल का छिड़काव एक सप्ताह के अंतराल पर दो बार करें। आलू की फसल की नियमित निरीक्षण करें। इस मौसम में फसल पर झुलसा रोग का अधिक प्रकोप होने की संभावना है। बचाव के लिए रिडोमील नामक दवा का 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। खेतों में नमी को देखते हुए आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। टमाटर, मटर एवं मक्का की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। चने की फसल में सूरी कीट की निगरानी करें। यह कीट चने की फलियों में छेद कर के अंदर प्रवेश कर जाती है और दानों को खाकर खोखला कर देती है। जिससे उपज में काफी कमी आती है। यह कीट दिन में भी पौधे में लगी फलियों में आधी घुसी हुई और आधी लटकी हुई देखा जा सकता है। इससे बचाव हेतु खेतों के पास प्रकाश प्रपंच लगाकर और कीटों को आकर्षित करते हुए उसे नष्ट कर इसकी संतति को कम किया जा सकता है। फ़िरोमोन प्रपंच तीन से चार प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगाएं, यदि कीट की संख्या अधिक हो तो स्पेनोसेड एक मिलीलीटर प्रति तीन लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। पिछात गेहूं में दीमक कीट का प्रकोप दिखाई देने पर बचाव हेतु क्लोरोपाइरीफ़ास 20 ई सी दवा का दो लीटर प्रति एकड़ की दर से 20 से 30 किलो बालू में मिलाकर शाम के समय खेत में छिड़काव कर सिंचाई करें। विलंब से बोई गई गेहूं की 21 से 25 दिनों की फसल में सिंचाई कर 30 किलो नेत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से ऊपरिवेशन करें। सरसों की फसल में लाही कीट की नियमित रूप से निगरानी करें। यह सूक्ष्म आकार का कीट पौधों के सभी मुलायम भागों तने व फ़लियो का रस चूसते हैं। यह कीट मधु स्राव निकालते हैं। जिससे पौधे पर फंगस का आक्रमण हो जाता है, तथा जगह-जगह काले धब्बे दिखाई देते हैं। ग्रसित पौधों में शाखाएं कम लगती हैं पौधों की बढ़वार रुक जाती है। पौधे पीले पड़कर सूखने लगते हैं। फलियां कम लगती हैं तथा तेल की मात्रा में भी कमी आती है। इस कीट से बचाव के लिए डाईमेथोएट 30 ई सी दवा का एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

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