There is a village in Banka where people do not eat onions - बांका का एक गांव ऐसा भी जहां लोग नहीं खाते प्याज DA Image
13 दिसंबर, 2019|12:35|IST

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बांका का एक गांव ऐसा भी जहां लोग नहीं खाते प्याज

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कुमरडीह के ग्रामीणों ने सदियों से नहीं चखा है प्याज का स्वादवंश वृद्धि के लिए पूर्वजों ने लिया था संकल्पआज भी निभा रहे ग्रामीण

पंजवारा (बांका)। निज प्रतिनिधि

सुनकर सहज विश्वास नहीं होगा पर यह सच है कि बांका जिले के पंजवारा के सीमावर्ती धोरैया प्रखंड क्षेत्र के चलना पंचायत अंतर्गत कुमरडीह बारी यादव टोला के लोगों ने आज तक प्याज का स्वाद नहीं चखा। यह आस्था और परंपरा का प्रतिबंध है। आज के दौर में जबकि स्वाद के लिए प्याज हर घर की रसोई की जरूरत बन गई है। प्याज की बढ़ती कीमतें इन दिनों आम लोगों को खून के आंसू रुला रही है। वहीं इस गांव के ग्रामीण इस मामले में नजीर पेश कर रहे हैं। 70 घरों के लगभग एक हजार की आबादी वाले कुमरडीह गांव के ग्रामीण 10 पीढ़ियों से प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा का सेवन नहीं करते हैं। इसके पीछे का एक दिलचस्प किस्सा यह है कि इस गांव में वंश वृद्धि नहीं हो रही थी। एक बार इस गांव में साधु महात्मा का आगमन हुआ। गांव के प्रबुद्ध लोगों ने साधु के समक्ष अपनी व्यथा रखी। साधु ने लोगों को कुछ नया करने को कहा। लोगों ने साधु की बातों को सहर्ष स्वीकार कर अंगीकार करने लगे।कबीर पंथ स्वीकार करने के बाद गांव में होने लगी वंश वृद्धिगांव में कबीर पंथ के अनुयायी बने वृद्ध ग्रामीण राम यादव, कैलाश यादव, मंदेश्वरी यादव, संजय यादव, मनोज यादव, वृषकेतु दास उर्फ यादव, वकील यादव आदि ने बताया कि वर्षों पूर्व गांव में एक साधु आए थे। उनको हमारे पूर्वजों ने वंश वृद्धि नहीं होने के बारे में अवगत कराया। ग्रामीणों ने बताया कि बच्चा जन्म लेते ही काल के गाल में समा जाता था। साधु ने ग्रामीणों को बताया कि वंश में वृद्धि होगी लेकिन, इसके लिए कुछ हटकर काम करना होगा। साधु ने ग्रामीणों को कबीर पंथ के अनुयायी बनने की बात कही। तभी से कुमरडीह गांव के ग्रामीण कबीरपंथी हो गए और प्याज-लहसुन, मांस-मछली, मदिरा आदि का सेवन करना बंद कर दिया। गांव की नई पीढ़ी भी प्याज से दूरी बनाए हुए है। हां,नई पीढ़ी के कुछ लोग अगर गांव से बाहर या रिश्तेदारी में इसका सेवन कर लेते हैं तो इस पर कोई पाबंदी नहीं है। मांस-मछली का सेवन करते ही ग्रामीणों पर पड़ता है बुरा प्रभाव:ग्रामीणों ने बताया कि कबीर पंथ को मानने के बाद गांव के कुछ लोग राह भटक गए थे, और उन्होंने मांस-मछली एवं मदीरे का सेवन करना प्रारंभ कर दिया। जिसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। मांस-मछली मदिरा का सेवन करने वाले लोगों को तरह-तरह की बीमारियां होने लगी। मिसाल के तौर पर ग्रामीणों ने बताया कि कुछ महीने पहले गांव के एक युवक ने मांस का सेवन कर लिया। मांस का सेवन करते ही उसकी स्थिति बिगड़ गई। हालात यहां तक पहुंच गयी कि घरवालों ने काफी मशक्कत के बाद उसकी जान बचायी।यहां की लड़कियां अपने ससुराल में भी नहीं करती हैं प्याज का सेवनकुसमी देवी, पुतुल देवी, शोभा देवी भगवानी देवी आदि महिलाओं ने बताया कि यहां की लड़कियां जब ब्याह कर अपने ससुराल जाती हैं तो वे भी प्याज का सेवन नहीं करती हैं। महिलाओं ने बताया कि जब वे अपने मायके से ससुराल कुमरडीह गांव पहुंची तो, यहां पूर्व से चली आ रही परंपरा को अपना लिया और बिना प्याज लहसुन के ही उन्हें भोजन स्वादिष्ट लगने लगा। अब तो उन लोगों को बिना प्याज लहसुन के खाना बनाने की आदत सी पड़ गई है। कुमरडीह गांव में प्याज लहसुन नहीं खाने की परिपाटी पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी बदस्तूर जारी है।

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