अलाव के सहारे ज़िंदगी: कड़ाके की ठंड में गरीबों, मजदूरों की रात
पेज चार की लीडपेज चार की लीड कड़ाके की ठंड में भी ठिठुर रही है गरीबों-मजदूरों की ज़िंदगी शहरी इलाके में भी गरीब वर्ग को नहीं बंट सका है

बांका, नगर प्रतिनिधि। ठंड हर साल आती है। शहरों में लोग रजाई-हीटर के बीच सुकून की नींद सो जाते हैं, लेकिन सवाल हर बार वही रह जाता है क्या ये शहर सिर्फ पक्के मकानों में रहने वालों का है या उन लोगों का भी, जो कड़कड़ाती ठंड में कांपते हुए अलाव के सहारे रात काटते हैं? बांका जिले में इन दिनों ठंड ने गरीबों और दिहाड़ी मजदूरों की जिंदगी को और कठिन बना दिया है। न्यूनतम तापमान लगातार 6-8 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है। ऐसे में झुग्गी-झोपड़ियों, प्लास्टिक और टीन की अस्थायी छतों के नीचे रहने वाले हजारों लोग ठंड से जंग लड़ रहे हैं।
बांका की ठंडी रातों में गरीबों की जिंदगी अलाव की आग जितनी ही अस्थायी है। एक चिंगारी बुझते ही अंधेरा और ठंड फिर हावी हो जाती है। कड़ाके की ठंड ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि शहरी इलाकों में रहने वाला गरीब वर्ग भी इस ठंड से राहत पाने में असहाय नजर आ रहा है। जहां एक ओर प्रशासन द्वारा ठंड से बचाव के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गरीबों और मजदूरों की ज़िंदगी आज भी ठिठुरने को मजबूर है। नगर परिषद क्षेत्र में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, फुटपाथ विक्रेता और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित हैं। जबकि सरकारी योजनाओं के तहत कंबल वितरण की बात तो की जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी तस्वीर कुछ और ही है। शहरी क्षेत्र के कई वार्डों में अब तक गरीब वर्ग को ढंग से कंबल नहीं बंट पाए हैं। जिन इलाकों में वितरण हुआ भी है, वहां संख्या बेहद कम रही। हालात ऐसे हैं कि नौ-नौ लोगों का परिवार एक ही कंबल में रात काटने को मजबूर है। वहीं इस ठंड से बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे सबसे ज्यादा परेशानी झेल रहे हैं। इधर भीषण ठंड ने गरीब तबके की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खुले आसमान, फुटपाथों और अस्थायी झोपड़ियों में रहने वाले लोग रात भर ठंड से कांपते रहते हैं। पर्याप्त गर्म कपड़े और कंबल न होने के कारण उन्हें ठीक से नींद नहीं मिल पा रही है। जबकि कई लोग पूरी रात अलाव के सहारे जागते रहते हैं और सुबह होने का इंतजार करते हैं। ठंडी हवा और गिरता तापमान ख़ासकर बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। हालांकि शहरी क्षेत्र में नगर परिषद और अन्य सरकारी विभागों द्वारा कंबल वितरण लगातार किया जा रहा है, लेकिन जरूरत के अनुरूप वो भी नाकाफी है। जिले में ठंड बढ़ने के साथ ही गरीब वर्ग में सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में धीरे धीरे तेजी आ रही है। पर्याप्त गर्म कपड़ों और सुरक्षित आवास की कमी के कारण बुजुर्गों और मजदूर वर्ग की सेहत पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। वहीं बच्चों में ठंड से निमोनिया का खतरा गंभीर रूप लेता जा रहा है। डॉक्टरों के अनुसार ठंडी हवा, गंदगी और समय पर इलाज न मिलने से बच्चों की स्थिति भी बिगड़ सकती है।साथ ही स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को गर्म कपड़े पहनने, बच्चों को ठंड से बचाने और लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेने की अपील की है। करहरिया की 65 वर्षीय हीरा देवी खांसते हुए कहती हैं, कि“सीने में जलन रहती है, सांस लेने में दिक्कत होती है। डॉक्टर के पास जाने से डर लगता है, कहां से पैसे लाएं?”गरीबों के लिए ठंड का मतलब सिर्फ कंपकंपी नहीं, बल्कि डर है, बीमार पड़ने का डर, काम छूटने का डर, इलाज का खर्च न उठा पाने का डर, कई मजदूर बताते हैं कि सर्दी-खांसी या बुखार होने पर वे काम पर नहीं जा पाते, जिससे परिवार का चूल्हा ही ठंडा पड़ जाता है। शहर के कटोरिया स्टैंड स्थित रैन बसेरा इन दिनों जरूरतमंद लोगों के लिए राहत का केंद्र बना हुआ है। प्रतिदिन यहां अच्छी संख्या में लोग ठहर रहे हैं और उपलब्ध व्यवस्थाओं से संतुष्ट नजर आ रहे हैं। मंगलवार की रात रैन बसेरे में कुल 13 लोगों ने रात्रि विश्राम किया। ठंड के मौसम को देखते हुए रैन बसेरे में साफ-सुथरे बिस्तर, कंबल, पीने के पानी और शौचालय की समुचित व्यवस्था की गई है। यहां ठहरने वाले यात्रियों और दिहाड़ी मजदूरों का कहना है कि नगर प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्था सराहनीय है, जिससे उन्हें ठंड में खुले आसमान के नीचे सोने की मजबूरी नहीं रहती। रैन बसेरे की नियमित सफाई भी की जा रही है, जिससे स्वच्छता बनी हुई है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि आगे भी जरूरत के अनुसार व्यवस्थाओं को और बेहतर किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सके। हालांकि, इस शीतलहर में भी वहां मंगलवार को अलाव की कोई व्यवस्था नहीं पाई गई। पूछने पर प्रबंधक द्वारा बताया गया कि, प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में अलाव की व्यवस्था नगर परिषद के द्वारा करवाई जाती है। मगर मंगलवार को देर शाम तक अलाव नहीं पहुंच सका। मगर फिर भी रेन बसेरा में ठहरे यात्रियों ने बताया कि, कंबल की समुचित व्यवस्था होने से ठंड का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ रहा। मंगलवार को जिले का अधिकतम तापमान 17 डिग्री सेल्सियस रहा जबकि जिलेभर में बहे करीब 10 किलो प्रति घंटे की रफ्तार से ठंडी हवा के कारण जिले का मौसम काफी सर्द रहा। जिस वजह से जिले का न्यूनतम तापमान 8 डिग्री सेल्सियस के करीब दर्ज किया गया। नगर परिषद द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर अलाव जलाने की योजना भी नियमित रूप से लागू नहीं हो पा रही है। शहर के चौक-चौराहों पर तो शाम ढलते ही अलाव जलते दिख जाते हैं। मगर नगर परिषद क्षेत्र से सटे बस्तियों में अलाव जलाने की व्यवस्था या तो है ही नहीं या फिर कभी-कभार ही होती है। मजबूरी में गरीब लोग निजी तौर पर लकड़ी, कचरा या प्लास्टिक जलाकर ठंड से बचने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है। जबकि पहले ही महंगाई और बेरोज़गारी से जूझ रहे शहरी गरीबों के लिए ठंड एक नई चुनौती बन गई है। मजदूरी के अवसर कम होने से आय घट गई है और ऐसे में गर्म कपड़े या ईंधन खरीदना उनके लिए आसान नहीं। रातें खुले आसमान या टीन-शेड के नीचे गुजर रही हैं, जहां ठंडी हवा और शीतलहर उनके लिये जानलेवा साबित हो सकती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते पर्याप्त कंबल वितरण और नियमित अलाव की व्यवस्था की जाए तो काफी हद तक गरीबों को राहत मिल सकती है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन जमीनी स्तर पर हालात का जायजा ले और शहरी गरीबों को ठंड से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि कड़ाके की ठंड में कोई ज़िंदगी यूं ही ठिठुरने को मजबूर न रहे। हालांकि शहरी क्षेत्र में ऊंची ऊंची इमारत के बीच उन गरीबों की झोपड़ी समाज के बीच प्रदर्शित नहीं हो पाती। अगर किसी प्रकार से किसी जनप्रतिनिधि या फिर अधिकारियों को शहर के किसी झोपड़ी में काँपकपाते परिवार दिख जाते हैं तो सरकारी प्रक्रिया ही इतनी होती है कि तब तक या तो ठंड चली जाती है, या फिर उन कागजी प्रक्रिया में वह योग्य नहीं पाए जाते। जिस कारण से बीते पूस में भी कई परिवारों को एक और सर्दी सरकारी आवंटन के उम्मीद में ही गुजर रहा है।

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