
पांच दशक पूर्व बौंसी मेले की नौटंकी देखने दूर-दूर से लोग आते थे
बौसी मेले की शान हुआ करता था थिएटर बौसी मेले की शान हुआ करता था थिएटर बंद होने से मेले की रौनक पड़ी फीकी थिएटर और सर्कस लगने से मेले के व्यवसाय पर पड
बौंसी, निज संवाददाता। ऐतिहासिक मंदार क्षेत्र का बौसी मेला कभी परंपरागत नौटंकी एवं सर्कस आदि मनोरंजन गृहों के लिए जाना जाता था। लेकिन 11 साल पूर्व मेला में हुई एक छोटी सी घटना के बाद बौसी मेले में थिएटर का प्रदर्शन बंद हो गया है । नौटंकी थिएटर एवं अन्य मनोरंजन के साधन आने बंद हो गए का व्यापक असर बौसी मेले पर पड़ा है और लोगों की आवाजाही भी कम हुई साथ ही मेले का अवधी भी कम हो गया। बिहार के सुप्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मारे गए गुलफाम पर बनी फिल्म तीसरी कसम और उसका हीरामन थियेटर की नर्तकी हीराबाई के माहौल की याद बौंसी मेले में नौटंकी देखने को मिलती थी।

बौंसी मेला का इतिहास करीब डेढ़ सौ साल पुराना है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि 8 2 सालों से बौसी मेले में थिएटर सहित अन्य मनोरंजक गृहों का आगमन हो रहा है। 70 के दशक में तो बौसी मेला की रौनक काफी होती थी इसकी ख्याति ऐसी थी कि यहां मेले में मनोरंजन के लिए नौटंकी, सर्कस एवं खेल तमाशे देखने बिहार झारखंड सहित अन्य जगहों से लोग खींचे चले आते थे। बौसी मेले में जहां कास्ट निर्मित बर्तन लकड़ी के खेती के सामान की खरीदारी किसान करते ही थे शाम ढलते ही वे लोग मनोरंजन के लिए मेला परिसर में लगे नौटंकी देखने लगते थे। लोगों के मनोरंजन के लिए यहां नौटंकी की शुरुआत की गई जो कई दशकों तक चली। अंतिम में 2014 तक बौंसी मेले में नौटंकी का प्रदर्शन होते रहा। मेले में घूमने और देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे और रात मेले में ही गुजारते थे और फिर जरूरत के सामान की खरीदारी कर वापस लौट जाते थे। स्थानीय साहित्यकार मनोज कुमार मिश्र आदि बताते हैं कि बौसी मेला में गुलाब बाई स्वयं आती थी और उनके गीत नदी नाले न जाओ श्याम पैया पड़ो... सुनकर लोग भाव विभोर हो जाते थे। बौसी मेला में गुलाब भाई हीराबाई थिएटर कंपनी एवं बजरंग थिएटर के अलावा विभिन्न बड़े-बड़े सर्कस आते थे जो लोगों को मनोरंजन करते थे। नौटंकी कंपनी मेले की रौनक बनी, जिसमें गुलाब बाई और कृष्णा बाई जैसी मंजी हुई कलाकार होती थीं, जिन्हें देखने के लिए पूरे राज्यभर से लोग आते थे । मेले में राजा हरिश्चंद्र मां का कलेजा नागिन सुल्ताना डाकू चंद्रशेखर आजाद आदि नाटकों का मंचन होता था। बाद में यहां बजरंग थिएटर शोभा सम्राट थिएटर विकास थिएटर आदि आने लगे। बहरहाल, गौरवशाली इतिहास को समेटे इस मेले की रौनक और मेले को लेकर लोगों में उमंग आज भी मौजूद है। जरूरत है कि इस मेले के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के प्रचार प्रसार करने की जिससे देश और विदेश के सैलानियों को भी यह मेला आकर्षित कर सके। अब तमाम प्रकार के मनोरंजन गृहों का आना भी बंद हो गया है। पिछले दिनों आयोजित बौसी मेला आयोजन समिति की बैठक में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अलावा भाजपा जिला अध्यक्ष ब्रजेश कुमार मिश्र उर्फ विक्की मिश्रा ने बौसी मेला में थिएटर सरकार सर्कस एवं अन्य मनोरंजन ग्रह को वापस लाने की मांग की है। दूसरी तरफ इससे वासियों की भी मांग है कि लोगों को आकर्षित करने क लिए मेला को पुन इस स्वरूप में स्थापित किया जाए। क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है पुनः बौसी मेला उसी स्वरूप में फिर से लगेगा।

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