
बांका : डहुआ के बुनकरों की नहीं सुधरी दशा और दिशा
बांका जिले के डहुआ गांव के बुनकरों की उम्मीदें विधानसभा चुनाव के दौरान फिर जाग उठी हैं। महंगाई और सरकारी उपेक्षा के कारण बुनाई उद्योग संकट में है। गांव के 90 प्रतिशत लोग इस उद्योग पर निर्भर हैं। बुनकरों ने स्पष्ट किया है कि वे केवल उन नेताओं का समर्थन करेंगे जो उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे।
बौंसी, निज संवाददाता। विधानसभा चुनाव की चहल-पहल के बीच बांका जिले के बुनकर बहुल गांव डहुआ के लोगों की उम्मीदें एक बार फिर जाग उठी हैं। चुनाव आते ही नेताओं द्वारा बुनकरों की समस्याओं को दूर करने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही ये वादे अक्सर धूल फांकते नजर आते हैं। डहुआ गांव में तैयार सूती साड़ी, लूंगी, गमछी और विशेष रूप से पंछी वस्त्र की पहचान बिहार ही नहीं, बल्कि उड़ीसा, असम, बंगाल और झारखंड तक है। करीब 15 हजार आबादी वाले गांव की 90 प्रतिशत जनसंख्या आज भी पॉवरलूम व हैंडलूम उद्योग पर निर्भर है।

एक समय था जब गांव में दिन-रात पावरलूम की आवाज गूंजती थी। गांव जागता था, घर-परिवार खुशहाल थे। लेकिन महंगाई, धागों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि तथा सरकारी उपेक्षा ने इस उद्योग को गहरी चोट पहुंचाई। कभी डहुआ में 4 हजार से अधिक पावरलूम चलते थे, जबकि फिलहाल करीब 150 पावरलूम ही किसी तरह सक्रिय हैं। पावरलूम बंद होने से बेरोजगारी की समस्या खड़ी हो चुकी है और युवा पलायन को मजबूर हैं। बुनकरों का कहना है कि यदि सरकार लीलन और सिल्क धागों की उपलब्धता सुनिश्चित करे तथा तकनीकी प्रशिक्षण दे, तो यह उद्योग फिर बुलंदियों पर पहुंच सकता है। इससे गांव में 10 से 15 हजार लोगों को रोजगार मिल सकता है। बुनकर कल्याण समिति के अध्यक्ष मुर्ताज अंसारी एवं सचिव मंसूर आलम ने कहा इस बार हमारा एक ही मुद्दा है बुनकरों का पुनरुत्थान। जो जनप्रतिनिधि हमारी समस्याओं का समाधान करेगा, हम उसे ही समर्थन देंगे। डहुआ के बुनकरों की स्पष्ट चेतावनी है कि चुनावी वादे अब खोखले सिद्ध नहीं होने चाहिए। लोग इस उम्मीद में हैं कि इस विधानसभा चुनाव में उनकी आवाज सत्ता की दहलीज़ तक पहुंचे और उनकी पहचान को फिर से गति मिले।

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