
चुनावी अभियान में भाषा की मर्यादा पर मतदाताओं की नजर
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बांका, निज संवाददाता। विधानसभा चुनाव के दोनों चरणों का चुनाव प्रचार अब समाप्त हो चुका है। अब फोकस पूरी तरह से मतदाताओं की ओर है। इस बार चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं ने किस हद तक भाषा की मर्यादा का पालन किया और कहां-कहां मर्यादा टूटी यह मुद्दा जिले भर के चाय दुकानों, चौपालों और बाजारों में चर्चा का विषय है। मतदाता खुलकर कह रहे हैं कि इस बार चुनावी मंचों पर मुद्दों की बजाय आरोप-प्रत्यारोप, व्यंग्य और कटाक्ष की भाषा अधिक सुनने को मिली। बांका शहर के गांधी चौक पर चर्चा कर रहे शिक्षक अजय कुमार कहते हैं, “चुनाव में भाषा सबसे बड़ी पहचान होती है।

लेकिन कई नेताओं ने ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल किया जो जनप्रतिनिधियों के स्तर को नीचे लाती है।” वहीं अमरपुर के किसान राजेश यादव का मानना है कि “जो नेता मर्यादा में रहकर बात करता है, वही भरोसेमंद लगता है। लेकिन इस बार कई वक्ताओं ने जनता की भावनाओं से अधिक विरोधियों को नीचा दिखाने पर ध्यान दिया।” चुनावी भाषणों में इस्तेमाल हुए कुछ शब्द तो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुए। कुछ नेताओं के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए युवा वर्ग ने मीम और पोस्ट के जरिए अपनी नाराजगी जताई। कई जगहों पर लोगों ने यह भी कहा कि जब नेता मंच पर मर्यादा भूल जाते हैं, तो यह राजनीति के स्तर को कमजोर करता है। हालांकि कुछ नेताओं ने विकास, शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य और कृषि जैसे मूल मुद्दों पर सभ्य तरीके से अपनी बात रखी, जिसकी लोगों ने सराहना की। जिले में यह भी चर्चा रही कि भविष्य के प्रतिनिधि की पहचान सिर्फ पार्टी या चेहरे से नहीं, बल्कि उसकी भाषा और व्यवहार से भी होती है। मतदाता अब यह तय करने की सोच रहे हैं कि लोकतंत्र में सही प्रतिनिधि वही है जो शब्दों की मर्यादा समझता हो और जनता की गरिमा का सम्मान करता हो।

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