मंदार ब्रांड हर्बल गुलाल की देशभर में धूम, बांका से बंगाल, राजस्थान, दिल्ली तक पहुंचेगा रंग
डिमांड 10 क्विंटल से अधिक, उत्पादन मात्र 4 क्विंटलडिमांड 10 क्विंटल से अधिक, उत्पादन मात्र 4 क्विंटल 400 रुपये किलो बिक रहा प्राकृतिक अबीर बांका। जीते

बांका, जीतेन्द्र कुमार झा। होली का रंग इस बार बंगाल, राजस्थान और दिल्ली में बांका से जाएगा। बांका की महिला वन समिति द्वारा तैयार किया जा रहा “मंदार ब्रांड” हर्बल गुलाल देश के कई राज्यों में अपनी पहचान बना चुका है। इस वर्ष भी विभिन्न प्रदेशों से 10 क्विंटल से अधिक गुलाल की मांग आई है, लेकिन सीमित उत्पादन के कारण समिति केवल 4 क्विंटल गुलाल ही तैयार कर पा रही है। वन समिति के अध्यक्ष उपेंद्र यादव ने बताया कि रोजाना 5 से 7 किलो ही गुलाल तैयार हो पाता है। इसे बनाने में महिला वन समिति और जीविका की करीब 30 महिलाएं जुटी हैं।
मेहनत अधिक और प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक होने के कारण उत्पादन सीमित रहता है। इसी वजह से कई राज्यों की मांग पूरी नहीं हो पाती। बांका का यह हर्बल गुलाल केवल बाजार तक सीमित नहीं है। इसकी मांग राष्ट्रपति भवन से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक होती रही है। वर्ष 2012 में तत्कालीन डीएम द्वारा इस उत्पाद की ब्रांडिंग की गई थी। इसे “मंदार” नाम देकर पहचान दिलाई गई, जो मंदार पर्वत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। तत्कालीन प्रशासनिक प्रयासों से यह गुलाल बिहार के मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति तक भेजा गया, जिसके लिए समिति को शुभकामना पत्र भी प्राप्त हुआ था। उपेंद्र यादव के अनुसार, यह गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों से तैयार किया जाता है। इसमें सिन्दूर के बीज, पलाश के फूल और सीम के पत्तों का उपयोग किया जाता है। सिन्दूर के बीज से तैयार अबीर सबसे महंगा होता है। एक क्विंटल गुलाल तैयार करने में करीब 30 हजार रुपये खर्च आता है। बिक्री दर 400 रुपये प्रति किलो निर्धारित है। उपेन्द्र यादव ने बताया कि वर्ष 2009-10 में इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ बायोसोशल रिसर्च एंड डेवलपमेंट की टीम पलाश के जंगलों की खोज में बांका पहुंची थी। यहां पलाश की प्रचुरता को देखते हुए शोध कार्य शुरू हुआ। लगभग दो वर्षों के शोध के बाद हर्बल गुलाल बनाने में सफलता मिली। इस नवाचार के लिए कोलकाता की “संकल्प” संस्था तथा बिहार राज्य के “जीविका कोलेबरेशन विथ इनोवेशन काउंसिल” द्वारा सम्मानित किया गया। वर्ष 2014 में बिहार नवाचार फोरम ने भी इस पहल को पुरस्कृत किया। समिति ने जीविका दीदियों और महिला वन रक्षियों को विशेष प्रशिक्षण देकर उत्पादन को बढ़ावा दिया है। यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का भी सशक्त माध्यम बनी है। करीब 30 महिलाएं इससे जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। हालांकि मांग के अनुरूप उत्पादन नहीं हो पाने से समिति के सामने चुनौती बनी हुई है। यदि सरकारी सहयोग और संसाधन बढ़ें, तो बांका का “मंदार ब्रांड” हर्बल गुलाल देशभर में और व्यापक स्तर पर पहचान बना सकता है। इस होली, जब देश के कई राज्यों में लोग रंगों से सराबोर होंगे, तो उन रंगों में बांका की मिट्टी और महिलाओं की मेहनत की खुशबू भी घुली होगी।
लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।



