जिले में 20 हजार हेक्टेयर भूमि में होगी गरमा फसल की खेती
पेज तीन की लीडपेज तीन की लीड गरमा फसल की खेती के लिए किसानों को अनुदानित दर दी जा रही बीज जिले में खासकर गरमा मूंग व मक्का की खेती

बांका, निज प्रतिनिधि। हाल के कुछ वर्षों से बांका जिले के कृषि परिदृश्य में साकारात्मक बदलाव आया है। पारंपरिक रूप से धान और गेहूं की खेती पर निर्भर रहने वाले क्षेत्र के किसान अब गरमा फसल की खेती की ओर भी तेजी से अपने कदम बढा रहे हैं। यही वजह है कि इस गरमा सीजन के लिए जिले को 19 हजार 533 हेक्टेयर भूमि में गरमा फसल की खेती का लक्ष्य दिया गया है। इस योजना में सबसे अधिक जोर दलहन और मक्का की खेती पर दिया गया है, जो जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में मील का पत्थर साबित होगा। कृषि विभाग की ओर से किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में एक बडा कदम उठाया गया है। बांका जिला मूंग के उत्पादन का केंद्र बनने की राह पर अग्रसर है। जिससे कुल लक्ष्य का एक बडा हिस्सा, यानी 13 हजार 560 हेक्टेयर भूमि केवल मूंग की खेती के लिए आवंटित किया गया है। इसके बाद दूसरे स्थान पर मक्का है, जिसका लक्ष्य 2643 हेक्टेयर निर्धारित है। दलहन फसलों में उरद दाल के लिए 1257 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। तिलहन फसलों में तिल के लिए 444 और सूर्यमुखी के लिए 27 हेक्टर में खेती किये जाने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। इसके अलावा हरित खाद के तौर पर 1542 हेक्टेयर भूमि में ढैंचा की खेती का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, गरमा फसल की खेती को बढावा देने के लिए सरकार की ओर से किसानों के बीच अनुदानित दर पर बीज का वितरण किया जा रहा है। अनुदानित मूल्य पर उन्नत बीजों की उपलब्धता से किसानों की रूची गरमा फसल की खेती के प्रति बढी है। पूर्व के वर्षों में बीज की उंची कीमतों और कालाबाजारी के डर से किसान गरमा फसलों की खेती से दूरी बनाए रखते थे, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। विशेष यह कि ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से बीज वितरण की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया गया है। सबसे अच्छी बात यह है कि कृषि विभाग की ओर से दलहन और तिलहन के बीजों पर भारी सब्सिडी दी जा रही है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी खेती करना किफायती हो गया है। जिले के विभिन्न प्रखंडों में बीज सीधे किसानों के दरवाजे तक पहुंचाए जा रहे हैं, जिससे उनके समय और परिवहन लागत की बचत हो रही है। इस सीजन में मूंग, उडद, तिल, सूर्यमुखी और हाइब्रिड मक्का की खेती को विशेष रूप से बढावा दिया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक ब्रजेंदू कुमार ने बताया कि रबी फसल की कटाई और खरीफ फसल की बुआई के बीच जो समय बचता है, उसमें मूंग एक कैश क्रॉप के रूप में उभर रहा है। यह न केवल कम समय में तैयार होता है, बल्कि मिट्टी की नाईट्रोजन सोखने की क्षमता बढाकर उर्वरक भी बनाता है। बदलते मौसम और गिरते भू-जल स्तर को देखते हुए जलवायु अनुकूल खेती समय की मांग है। जिले में जहां सिंचाई के संसाधन सीमित हैं, वहां गरमा फसल की खेती वरदान साबित हो रही है। जिले में इस गरमा सीजन में गरमा फसल की खेती का प्रत्यक्षण भी किया जाएगा। इसके लिए यहां 500 एकड भूमि में मूंग और 125 एकड भूमि में होगा सूर्यमुखी की खेती का प्रत्यक्षण होगा। इसके लिए चयनित किसानों को शत-प्रतिशत अनुदान पर बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। प्रत्यक्षण की सफलता के बाद यहां मूंग और सूर्यमुखी की खेतीा का लक्ष्य बढाया जाएगा.
कहते हैं अधिकारी
धान और गेहूं की तुलना में गरमा फसल की खेती में बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। गरमा खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली है, जिससे प्रतिकूल मौसम में भी किसानों की आर्थीक स्थिति स्थिर बनी रहती है। इस गरमा सीजन में जिले में करीब 20 हेक्टेयर भूमि में गरमा फसल की खेती का लक्ष्य तय है। इसमें खासकर मूंग, मक्का, ढैंचा, उडद, तिल व सूर्यमुखी शामिल हैं।
त्रिपुरारी शर्मा, डीएओ, बांका।
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