Banka News: ट्रैक्टरों के शोर में विलुप्त हो रही हल-बैल की जोड़ी

हिन्दुस्तान, बांका
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Banka News: आधुनिक मशीन एवं ट्रैक्टर ने बदला खेती का अंदाज, फिर भी कुछ खेतों में बैलों की चाल से पलट रही मिट्टीआधुनिक मशीन एवं ट्रैक्टर ने बदला खेती का अंदाज, फिर

Banka News: ट्रैक्टरों के शोर में विलुप्त हो रही हल-बैल की जोड़ी

Banka News: बांका, नगर प्रतिनिधि। मौजूदा समय में खेत में ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट आधुनिक क़ृषि पद्धति की पहचान बन चुकी है।जिससे कुछ ही घंटों में बड़े खेत की जुताई पूरी हो जाती है। लेकिन आधुनिक खेती के इस दौर में भी जिले के कुछ खेत ऐसे हैं, जहां बैलों की चाल के साथ मिट्टी पलटती दिखाई देती है।मंगलवार को बांका थाना क्षेत्र के गोड़ा के किसान परमेश्वर यादव अपने खेत में बैलों की जोड़ी के साथ हल चलाते नजर आए।कीचड़ से सने खेत में बैलों के कदम बढ़ते रहे और हल के पीछे-पीछे किसान भी पसीना बहाते रहे। यह दृश्य बदलते खेती के तौर-तरीके के बीच पुरानी कृषि परंपरा की याद दिलाता रहा।

करीब डेढ़ दशक पहले तक जिले के गांवों में हल-बैल से खेत की जुताई आम बात थी। किसान सुबह बैलों की जोड़ी लेकर खेत पहुंचते थे और दिनभर मेहनत कर जमीन को बुआई के लिए तैयार करते थे। खेतों में बैलों की घंटियों की आवाज और हल चलाते किसानों का नजारा ग्रामीण जीवन का हिस्सा हुआ करता था। धीरे धीरे समय बदला तो ट्रैक्टर गांवों तक पहुंचने लगे जिससे खेती का तरीका भी बदल गए और ट्रैक्टर से कम समय में अधिक खेत की जुताई होने लगी।इससे किसानों को मेहनत और समय दोनों की बचत भी होने लगी। कलयुग के इस दौर में हल-बैल की जगह मशीनों ने ले ली और जुबान से निकली कलयुग माने "कल-पुर्ज़े का युग" से मुहावरे भी सार्थक साबित होने लगे। अब अधिकांश किसान खेत तैयार करने के लिए ट्रैक्टर का ही सहारा लेते हैं। इसके बावजूद कुछ किसानों का बैलों से पुराना नाता पूरी तरह नहीं टूटा है।किसान परमेश्वर यादव बताते हैं कि, ट्रैक्टर से खेती का काम आसान जरूर हुआ है, लेकिन छोटे खेतों और कुछ खास परिस्थितियों में बैल आज भी काम आते हैं। हालांकि, बैलों से खेत की जुताई करने में समय और मेहनत दोनों अधिक लगते हैं, लेकिन यह तरीका वर्षों से चली आ रही खेती की परंपरा से जुड़ा हुआ है। जिले के कुछ अन्य ग्रामीणों का कहना है कि, बदलते समय के साथ खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ना जरूरी है, लेकिन हल-बैल से जुड़ी पुरानी परंपरा भी गांवों की पहचान रही है। ऐसे में परमेश्वर यादव जैसे किसान आधुनिकता के बीच उस पुरानी तस्वीर को अब भी जिंदा रखे हुए हैं। ट्रैक्टरों के शोर के बीच खेत में बैलों की चाल और हल से पलटती मिट्टी आज भी बीते दौर की कहानी को जीवंत बनाते नजर आती है।

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