अत्याधुनिक खेती में लागत अधिक मुनाफा हो रहा कम

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पेज चार की लीडपेज चार की लीड धरतीपुत्रों की व्यथा पिछले दो दशक में पारम्परिक हल की जुताई को छोड़ आधुनिक ट्रैक्टर से अपने खेतों की जुताई

अत्याधुनिक खेती में लागत अधिक मुनाफा हो रहा कम

बांका, नगर प्रतिनिधि। हल छूटा, ट्रैक्टर आया, समय बचा, पर जेब हुई हल्की, मेहनत घटती दिखी ज़रूर, पर मुनाफ़ा आज भी उतनी ही छलकी। प्रस्तुत पंक्तियां ना केवल जिले के पारंपरिक कृषि व्यवस्था के बदले स्वरूप को प्रदर्शित करती है, बल्कि हमारे जिले के धरतीपुत्रों के सीने के दर्द को भी बखूबी बयां कर रही है। पिछले दो दशकों में जिले की कृषि व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जहां कभी हमारे जिले के किसान पारंपरिक हल से बैलों के सहारे खेतों की जुताई करते थे, वहीं अब आधुनिक ट्रैक्टरों ने उनकी जगह ले ली है। जिले में आए इस क्रांति ने खेती को आसान और तेज तो जरूर बनाया है, लेकिन इसके साथ ही किसानों की लागत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

जिले के अधिकांश किसानों का यह मानना है कि, ट्रैक्टर से जुताई करने में समय और मेहनत दोनों की बचत होती है। पहले जहां एक खेत की जुताई में कई दिन लग जाते थे, वहीं अब कुछ ही घंटों में यह कार्य पूरा हो जाता है। इससे किसान समय पर बुआई कर पाते हैं और उत्पादन बढ़ाने की संभावना भी बनती है। मगर किसानी आज भी उतनी ही महंगी है जितने हमारे पूर्वजों के समय सस्ती मानी जाती थी। ट्रैक्टर किराये पर लेना या खुद का ट्रैक्टर खरीदना छोटे और मध्यम किसानों के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ रहा है। इससे खेती की लागत में लगातार हो रही बढ़ोतरी किसानों के लिए चिंता का विषय बनते जा रहा है। बीज, खाद, कीटनाशक और फसल भंडारण जैसी आवश्यक चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसके अलावा आधुनिक तकनीकी संसाधनों को अपनाने में भी किसानों की जेब काफी हद तक खाली हो जा रही है।जिले के कई किसानों ने बताया कि, खेती अब पहले की तुलना में कहीं अधिक खर्चीली हो गई है, जबकि आमदनी में उतनी बढ़ोतरी नहीं हो पाई है। इधर सिंचाई के क्षेत्र में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का कुछ सकारात्मक असर जरूर देखने को मिल रहा है। खेतों तक बिजली पहुंचने से जिले के किसानों को सिंचाई में सुविधा हुई है और डीजल पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है। फिर भी, कई इलाकों में बिजली की अनियमित आपूर्ति और अन्य तकनीकी समस्याएं किसानों की परेशानी फिलहाल बढ़ा रहे हैं। इनमें किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य न मिल पाना सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है।परिणामस्वरूप, उन्हें मजबूरी में कम या नगण्य मुनाफे पर ही अनाज बेचना पड़ता है। इससे ना केवल उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है बल्कि उनके कर्ज का बोझ भी बढ़ते जा रहा है। इसके अलावा, बेमौसम बारिश और सुखाड़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं किसानों की मुश्किलें और बढ़ा देती हैं। कभी अचानक बारिश से फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी सूखे की स्थिति में उत्पादन ही घट जाता है। इन परिस्थितियों में जिले के धरतीपुत्रों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है, जिससे उनका मनोबल भी काफ़ी हद तक प्रभावित होता है। आधुनिक तकनीकों के उपयोग से खेती में जहां एक ओर सहूलियत आई है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती लागत और प्राकृतिक चुनौतियों ने जिले के अन्नदाताओं की स्थिति को जटिल बना दिया है। ऐसे में जरूरत है कि, सरकार किसानों को उचित मूल्य दिलाने, लागत कम करने और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि हमारे जिले के अन्नदाताओं की स्थिति में सुधार हो सके।क्या कहते हैं अधिकारीपिछले वर्षों में जिले में कृषि के आधुनिकीकरण से उत्पादकता और कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है। सरकार किसानों को बेहतर बीज, सब्सिडी, सिंचाई सुविधा और तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध करा रही है। साथ ही फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि किसानों की आय बढ़े और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके।त्रिपुरारी शर्मा, जिला कृषि पदाधिकारी, बांका

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