नदियों में गाद की सफाई से बाढ़ से मुक्ति संग किसानों को होगा फायदा

Feb 16, 2026 11:49 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, बगहा
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पश्चिम चंपारण जिले में नदियों में गाद भरने के कारण हर साल बाढ़ आती है, जिससे 30% आबादी प्रभावित होती है। बारिश के दौरान नदियां उफान पर आ जाती हैं, जिससे फसलें बर्बाद होती हैं और जान-माल का नुकसान होता है। बांधों की कमी और गाद की सफाई नहीं होने से समस्या और बढ़ रही है।

नदियों में गाद की सफाई से बाढ़ से मुक्ति संग किसानों को होगा फायदा

नदियों में गाद भर गया है। गाद भर जाने के कारण नदियों छिदली हो गई हैं। हल्की बारिश में नदियां उफान पर आ जाती है। पानी का फैलाव चारों ओर हो जाता है। जिसके कारण पश्चिम चंपारण जिले की 30 फीसदी आबादी प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित होती है। सैकड़ों एकड़ फसल बर्बाद हो जाती है। जान-माल की भारी नुकसान होता है। करोड़ों रुपए के फसल बर्बाद हो जाते हैं। पश्चिम चंपारण जिले में गंडक, सिकराहना, हड़बोड़ा, मसान समेत दो दर्जन से ज्यादा छोटी-बड़ी पहाड़ी नदियां बरसात के दिनों में तांडव मचाती हैं। अधिकांश नदियों पर बांध नहीं है। नेपाल में बारिश होने पर पश्चिम चंपारण में बहने वाली नदियां खतरनाक हो जाती हैं।

नेपाल का क्षेत्र पहाड़ी है वहां बारिश होने पर पानी से जिले की नदियों में तेजी से आती हैं। गाद की सफाई नहीं होने से तल ऊपर उठा हुआ है। जगह-जगह टापू बन गए हैं। क्षमता से कम बारिश होने के बावजूद नदियां उफान मारने लगती हैं। प्रतिवर्ष बाढ़ से हजारों परिवार विस्थापित हो जाते हैं। कटाव से नदियों का स्वरूप बदल जाता है। विवेक कुमार, राजेश्वर शाह, सुनील ठाकुर, अनूप तिवारी ने बताया कि 20 वर्ष पूर्व अत्यधिक बारिश होती थी। उसकी अपेक्षा वर्तमान में औसतन से भी कम बारिश हो रही है। लेकिन बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है। नदी के किनारे बसे लोगों को विस्थापित होना पड़ता है। तीन से छह महीने तक वे लोग तटबंध व ऊंचे स्थान पर शरण लेने के लिए मजबूर होते हैं। अगर नदियों से गाद निकालने की व्यवस्था हो जाए तो बाढ़ और कटाव से निजात मिल सकती है। यहीं नहीं गाद की निकासी से रोजगार के बड़े अवसर पैदा होंगे। एक नदी को दूसरे नदी से जोड़ने से भी बाढ़ का खतरा कम हो जाएगा। जिन नदियों पर बांध नहीं है। वहां बांध का निर्माण कराया जाए। ताकि प्रति वर्ष बाढ़ की समस्या से निजात मिल सकें। पश्चिम चंपारण जिले के बगहा एक और दो, योगापट्टी, बैरिया और नौतन प्रखंड की एक तिहाई आबादी प्रति वर्ष बाढ़ की मार झेलती है। जिनका स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है। इतना ही नहीं पहाड़ी नदियों में गाद भर जाने से दोन क्षेत्र की 30 फीसदी से ज्यादा की आबादी प्रभावित होती है। दोन क्षेत्र में नदियों में गाद के साथ-साथ पत्थर भरा पड़ा है। कृष्ण दास, माधव महतो, रामचंद्र पाल, बरसाती शर्मा ने बताया कि 30 वर्ष पहले भारत नेपाल सीमा पर पत्थर खनन का काम होता था, जो अभी बंद है। पत्थर खनन होने से नदियों के प्रवाह में रुकावट नहीं आती थी। पत्थर खनन होने से सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती थी। अधिक से अधिक लोगों को रोजगार भी मिलता था। अधिकांश नदियां पत्थरों से भरी पड़ी है। जमुनिया, सहोदरा, ठोरी में पत्थर खनन का काम होता था। लेकिन सरकार ने पर्यावरण प्रदूषण का हवाला देकर बंद करा दिया है। लोग बताते हैं कि अकेली पंडई नदी में 40 फीट तक बालू-पत्थर भर गये हैं। जो नदी 40 फीट गहरी थी, अब छिडली हो गई है। जिसका असर प्रतिवर्ष बरसात के दिनों में देखने को मिलती है। नदियों के गाद हटाए जाने से दियरा क्षेत्र का विकास होगा। पश्चिम चंपारण जिले के नौतन, बैरिया, योगापट्टी, बगहा, पिपरासी, ठकराहा, धनहा, मधुबनी दियरा क्षेत्र में आते है। नदियों पर बांध से बाढ़ का खतरा होगा कम : नदियों पर बांध नहीं होने से बाढ़ का खतरा ज्यादा रहता है। बरसात के दिनों में इसका दायरा काफी बढ़ जाता है। बांध का निर्माण हो जाने से पानी का फैलाव सीमित क्षेत्र में होगा। जिससे फसलों की बर्बादी ज्यादा नहीं होगी। जमीन बंजर नहीं होगी। क्योंकि नदियां बाढ़ के समय अपने साथ गाद और बालू लाती है। जिससे नदियों के अगल-बगल की जमीनें बंजर हो रही है। पश्चिम चंपारण जिले के लगभग 20 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जल क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होती है। जल जमाव की समस्या नासूर बन गई है। जिसके कारण सबसे ज्यादा नुकसान फसलों की होती है। जल जमाव से गन्ने के साथ-साथ धान की फसलों की भी बर्बादी होती है। जिले में सिंचाई की सुविधा को देखते हुए नदियों के अगल-बगल सबसे ज्यादा गन्ने की खेती होती है। लेकिन बाढ़ से सबसे ज्यादा गन्ने की फसलों का नुकसान होता है। बांध का निर्माण हो जाने से कटाव पर अंकुश लगेगा। और फैसले बर्बाद नहीं होगी। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जलवायु परिवर्तन से लगभग प्रति वर्ष 30 हजार हेक्टेयर में लगे फसल बर्बाद हो जाते हैं। शहरीकरण का बढ़ता दायरा पर्यावरण प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। नदियों से नियमित रूप से गाद निकले और उसकी धारा को अविरल बहने दिया जाय तो यह बरदान से भी अधिक साबित होगी। शिकायतें: 1.पहाड़ी नदियों में बांध नहीं होने से प्रतिवर्ष बरसात के दिनों में हजारों एकड़ में लगी फैसलें बर्बाद हो जाती हैं। 2. नदियों के तल में गाद भर जाने के कारण हल्की बारिश में पहाड़ी नदियां उफान मारने लगती है। 3. पहाड़ी नदियों में बाढ़ आने से सैंकड़ों एकड़ में लगे पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं। इससे पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। 4. नदियों के छिछली होने से बाढ़ आने पर मिट्टी का कटाव होता है। सैंकड़ों एकड़ जमीन नदी में समा जा रही है। 5. पत्थर खनन बंद होने से नदियों के प्रवाह में रुकावट आ रही है। जगह-जगह टापू बन गया है। सुझाव: 1. नेपाल से आने वाली सभी पहाड़ी नदियों पर बांध बनाया जाएं। नदियों की धारा को नियंत्रित किया जाय। 2. नदियों के गाद का प्रयोग ईंट निर्माण में किए जाने से लोगों को रोजगार मिलेगा। 3. पहाड़ी नदियों में आने वाली बाढ़ पर नियंत्रण किया जाय। ताकि सैंकड़ों एकड़ में लगे पेड़-पौधों बचे। 4. बांध बनाने के दौरान उसमें ठोकर आदि का भी निर्माण किया जाय ताकि मिट्टी का कटाव नहीं हो। 5. नदियों में पत्थर व बालू का खनन फिर से शुरू किया जाय। इससे रोजगार के साथ राजस्व के अवसर बढ़ेंगे।

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