
अल्प मानदेय और मानसिक तनाव भविष्य बनाने वाले खुद अंधकार में
बिहार में कई वित्त रहित कॉलेजों के प्राध्यापकों को 2017 के बाद से अनुदान नहीं मिला है। इनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई है, और इन्हें सरकारी स्कूल के शिक्षकों के समान वेतन नहीं मिलता। उच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद सरकार सुप्रीम कोर्ट में जा रही है।
जिले में कई वित्त रहित कॉलेज संचालित हो रहे हैं। यहां छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं। चार डिग्री वित्त रहित अनुदानित कॉलेज के प्रोफेसरों का बुरा हाल है। उन्हें समान काम समानवेतन तो दूर समय पर अनुदान तक नहीं मिलता है। वित्त रहित प्रोफेसरों को वर्ष 2017 के बाद से बिहार सरकार द्वारा मिलने वाली अनुदान की राशि अब तक नहीं मिल पाई है। इस कारण इन प्रोफेसर की आर्थिक स्थिति डामाडोल हो गई है। प्रोफेसर का कहना है कि सिर्फ कॉलेज से मिलने वाले मानदेय के सहारे हम लोग जी रहे हैं। हम लोगों की हालत ऐसी है कि कहने के लिए कॉलेज के प्रोफेसर हैं।
लेकिन वेतन हाई स्कूल के शिक्षक से भी कम है। सरकारी के बराबर हमलोग वित्त रहित कॉलेज में हमलोग छात्रों को शिक्षा देते हैं। लेकिन समान काम के बदले समान वेतन हम लोग को सरकार नहीं दे रही है। कॉलेज के प्राध्यापकों का कहना है कि इस मामले में हाई कोर्ट में का डिसीजन उन लोगों के फेवर में आ चुका है लेकिन इसके बावजूद सरकार सुप्रीम कोर्ट के ओर जाने का रुख बनाई हुई है। उन लोगों के साथ नहीं देकर सरकार लड़ाई लड़ना चाहती है। जबकि यदि सरकार उन्हें हाई कोर्ट के डिसीजन के मुताबिक राशि दे तो प्राध्यापक खुश हो जाएंगे। डॉ राकेश कुमार वर्मा, अशोक कुमार सिंह आदि बताते हैं कि हमलोगों के काम के घंटे सरकारी प्राध्यापक की तरह ही है लेकिन जो सुविधा मिलनी चाहिए, वह शिक्षक की तरह भी नहीं मिल पाती है। हम लोग को भी प्राध्यापक की तरह सभी सुविधाएं सरकार को देनी चाहिए। सरकार यदि हमारी समस्याओं को सुनती, उसपर अमल करती हम लोग को सहूलियत देती तो हमारे भी घर परिवार बेहतर ढंग से चल पाते। प्रो. सुलेखा कुमारी, प्रो. कल्पना सिन्हा का कहना है कि हम लोग को काम करते 20 साल से ज्यादा हो गये, अभी तक जो सरकार से सहायता मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल पाई है। जब तक हम लोग के साथ समान काम समान वेतन की तरह फार्मूला लागू नहीं होगा तब तक हम लोग की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। प्रो. रश्मि वत्स बताती हैं कि सरकारी कॉलेज की तरफ हम लोग भी काॅलेजों में छात्रों को शिक्षा देते हैं। समय पर बिहार सरकार द्वारा अनुदान नहीं दिए जाने से हम लोगों को घर परिवार चलाने में कठिनाई होती है। कई बार कर्ज लेना पड़ता है। प्रो डॉ संजय सिंह, डॉ अवधेश शाह, डॉ एके ओझा, डॉ अशोक कुमार सिंह बताते हैं कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों के बराबर भी राशि हम लोग को नहीं मिल पाती है। अनुदान राशि मिलती है वह भी कम है। कई लोग को ट्यूशन पढ़ाना पड़ता है। कहने के लिए तो हम लोग कॉलेज के प्रोफेसर हैं, लेकिन प्रोफेसर की तरह सुविधा हम लोग को नहीं मिल पाती है। अन्य कॉलेजों के प्रोफेसर जैसी सुविधा हमें भी मिले। अब यदि समान काम समान वेतन लागू कर दे तो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति आएगी। इन कॉलेजों में शिक्षा का स्तर सुधरेगा। इसका फायदा छात्रों से लेकर समाज तक को होगा । इन कॉलेजों मेंसरकार को पाठ्यक्रम के अनुसार सुविधाएं भी बढ़ानी चाहिए। वित्त रहित कॉलेज जिले में शिक्षा की रीढ़ की तरह है। शिकायतें: 1. वित्त रहित कॉलेज के प्रोफेसर 20-20 साल से पढा रहे हैं लेकिन 2017 के बाद से अनुदान नहीं मिल रहा है। 2. कॉलेज से मिलने वाला मानदेय काफी कम है, जिससे घर का खर्च चलाने में परेशानी होती है। 3. समान काम समान वेतन की तर्ज पर अन्य कॉलेजों के प्रोफेसर की तरह राशि नहीं मिलती। 4. सरकार द्वारा अनुदान की राशि में अब तक इजाफा नहीं होने से प्रोफेसर को होती है परेशानी। 5. हाई कोर्ट द्वारा प्रोफेसरों के पक्ष में निर्णय आने के बाद भी सरकार आगे सुप्रीम कोर्ट में जा रही है।े सुझाव: 1. वित्त रहित कॉलेज के प्रोफेसर काफी समय से पढा रहे हैं, उन्हें अनुदान राशि समय पर दी जाए। 2. कॉलेज से मिलने वाला मानदेय काफी कम है ऐसे में इसमें भी इजाफा की व्यवस्था हो। 3. समान काम समान वेतन के तर्ज पर सरकार इन लोगों की समस्याओं का समाधान करें। 4. 2017 के बाद से अनुदान नहीं दिया गया है जल्द से जल्द अनुदान की राशि दी जाए 5. अनुदान की राशि में गुणात्मक रूप से वृद्धि की जाए जिससे कि इन्हें घर परिवार चलाने में परेशानी नहीं हो।

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