
हल-बैलों से खेती की परंपरा को जिंदा रखने की मिसाल हैं जयराम
फोटो- 12 अगस्त एयूआर 14 को लगभग हाशिए पर ला दिया है, कुटुंबा प्रखंड के जगदीशपुर पंचायत के किसान जयराम साव बैलों के सहारे खेती की प
आधुनिक कृषि यंत्रों के दौर में, जहां ट्रैक्टर और पावर टिलर ने खेती के पारंपरिक तरीकों को लगभग हाशिए पर ला दिया है, कुटुंबा प्रखंड के जगदीशपुर पंचायत के किसान जयराम साव बैलों के सहारे खेती की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। कभी खेत की जुताई, सामान ढोना, ईख पेरना और यात्रा तक, सब कुछ बैलों के भरोसे होता था। आज गौशालाओं से बैलों के घुंघरुओं की आवाज गायब हो चुकी है और उनकी सेवा की परंपरा भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। जयराम साव उन चुनिंदा किसानों में से हैं जो बैलों के साथ खेती को न केवल जीवित रखे हुए हैं, बल्कि इसे गर्व और आनंद के साथ कर रहे हैं।
बताते हैं कि बैलों के साथ खेती करने का मजा ही अलग है। चाहे धान की नर्सरी तैयार करना हो या खेत की जुताई और रोपनी, बैल मेहनती साथी हैं। यह तरीका मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखता है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाता। बैलों से खेती न केवल उत्पादन बढ़ाने में मदद करती है, बल्कि मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को भी संरक्षित रखती है। आधुनिक मशीनों के विपरीत, बैल कोई हानिकारक उत्सर्जन नहीं करते, जिससे खेती टिकाउ और पर्यावरण के लिए लाभकारी बनती है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और मध्यम आकार के खेतों में बैल आधारित खेती किफायती होने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देती है। यह तरीका न केवल लागत कम करता है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी बनाए रखता है।

लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




