नशा युवाओं और किशोरों को बना रहा मानसिक और सामाजिक रूप से खोखला

Newswrap हिन्दुस्तान, अररिया
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अररिया में 18 वर्षीय रंजन स्मैक के नशे का शिकार हो चुका है। उसके परिवार को इस स्थिति से शर्मिंदगी है, जिससे वे उसे नशा मुक्ति केंद्र नहीं भेज पा रहे। शहर में कई युवा स्मैक के जाल में फंसे हुए हैं। चिकित्सकों का कहना है कि नशे की लत युवाओं के लिए गंभीर चुनौती बन रही है।

नशा युवाओं और किशोरों को बना रहा मानसिक और सामाजिक रूप से खोखला

अररिया, निज संवाददाता 18 वर्ष की आयु में रंजन (बदला हुआ नाम) स्मैक के नशे का शिकार हो चुका है। पेशे से मजदूर रंजन के पिता इस बात से बहुत चिंतित हैं, लेकिन लोकलाज के भय से वह उसे नशा मुक्ति केंद्र भी नहीं भेज पा रहे। रंजन के भाई कहते हैं कि उसे नशा मुक्ति केंद्र भेजने पर उसके चरित्र पर एक ऐसा धब्बा लग जाएगा,जो उसके जीवन को और कठिन बना देगा। रंजन अकेला युवा नहीं है,जो नशे का शिकार है। अररिया शहर के दर्जनों युवा इस नशे की जद में आ चुके हैं। लेकिन, इनमें से कुछ युवा ही नशा मुक्ति केंद्रों तक पहुंच पा रहे हैं, क्योंकि रंजन के घर वालों की तरह ऐसे युवा के भी अभिभावक को लगता है कि नशा मुक्ति केंद्र जाने से उनकी प्रतिष्ठा पर कलंक लग जाएगा।अररिया जैसे छोटे शहर में स्मैक का नशा बहुत तेजी से फैल चुका है। ‘हिन्दुस्तान’ ने स्मैक के आदि हो चुके लोगों की तलाश शुरू की तो हर मोहल्ले से दर्जनों लोगों का नाम उजागर हुआ। ‘हिन्दुस्तान’ ऐसे युवाओं से बात करने की कोशिश की लेकिन ज्यादातर ने बातचीत करने से इनकार कर दिया। कुछ लोग तैयार हुए, लेकिन नाम और इनके मोहल्ले का नाम नहीं छापने की शर्त पर बातचीत की। 20 वर्षीय पिंटू (बदला हुआ नाम) पिछले दो सालो में तीन बार थाने का चक्कर लगा चुका है। घर वालों ने उसे नशा मुक्ति केंद्र भेजा। वहां वह तीन महीने रहा और नशे की लत से लगभग दूर हो गया, लेकिन वहां से लौटते ही वह दोबारा नशेड़ियों की सोहबत में आकर फिर नशे की गिरफ्त में चला गया। अभी वह अपने घर पर ही रहता है और उसने से कहा कि उसने नशा छोड़ दिया है। पिंटू नशे के संपर्क में तब आया था,जब उसकी 8 वीं की परीक्षा चल रही थी।नशे की लत लगने के बाद पढ़ाई लिखाई सब छूट गयी। पांच साल बाद भी पिंटू स्कूल की तरफ दोबारा नहीं लौट सका। पढ़ाई के बारे में पूछने पर उसने कहा,“अब मजदूरी कर रहा हूं। घर में पैसे की जरूरत है। पिंटू के पिता ने कहा कि नशे की लत छुड़ाने के लिए उसने अपने बेटे की यह सोचकर शादी करवा दी कि पत्नी आएगी तो सब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। लेकिन शादी के बाद भी उसका यह रवैया कायम रहा। अब तो पिंटू एक बच्चे के पिता भी बन गए हैं, बावजूद मौक़ा मिलते वह नशा करने से परहेज नहीं करता है। पिंटू के हमउम्र के कई लड़के नशा मुक्ति केंद्र जा चुके हैं। कुछ तो ठीक हो गए, लेकिन ज्यादातर आज भी इस दलदल से बाहर नहीं आ सके हैं। इस कच्ची उम्र के पक्का नशा करने वाले लड़कों में चोरी करने की प्रवृत्ति भी अक्सर देखी जाती है, क्योंकि इन्हें नशीला पदार्थ खरीदने के लिए पैसा चाहिए। नशा नहीं मिलने पर कितने ही लड़कों ने चोरी-छिपे घर का सामान तक बेच दिया।मंजीत (बदला हुआ नाम) एक गैरेज में काम करता है। बीते दिनों उसे भी कुछ दोस्तों ने सनफिक्स और स्मैक के नशे का आदत लगा दिया था।मंजीत आज नशे से दूर होने की कोशिश कर रहा है। उसकी मानें,तो उसका नशा ज्यादा गहरा नहीं था। उसने दो महीने पहले नशा न करने की ठानी और आज उसका जीवन धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है।

युवाओं में स्मैक व गांजा हो रहा है पॉपुलर:

चिकित्सकों के अनुसार स्मैक, जिसे काला हेरोइन भी कहते हैं,एक किस्म का ओपियोइड ड्रग होता है। इसकी लत लगने पर शरीर में काफी अलग-अलग अप्राकृतिक प्रभाव देखने को मिलते हैं।स्मैक का नशा करने वालों में कई लक्षण दिखते हैं,जैसे सुस्ती,बदन में दर्द,अकड़न, मतिभ्रम, भटकाव, परिवार से कटाव आदि।चूंकि स्मैक पेनकिलर जैसा काम करता है।इसलिए इसकी आदत पड़ जाने के बाद न मिलने पर शरीर के अलग अलग हिस्से में बहुत तेज दर्द होता है। कई बार उल्टियां आती हैं और आंख और नाक से पानी आने लगता है। हालांकि जिले में सूखे नशे की धरपकड़ जारी है, पुलिस ऑपरेशन प्रहार अभियान चला कर स्मैक,गांजा के अलावा नशीली कफ़ सिरप, नशीली दवाइयां जब्त कर रही है।बाबजूद स्मैक का प्रकोप नौजवानों में सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। आखिर स्मैक में ऐसा क्या है कि युवा पीढ़ी इतनी तेजी से इसके जाल में फंसती जा रही है? थोड़ी पूछताछ करने पर पता लगा कि जिले में स्मैक बहुत आसानी से उपलब्ध है।स्मैक का नशा बाकी नशे के मुकाबले ज़्यादा मजबूत होता है।

स्मैक के आदी बोले:

स्मैक के आदी एक नौजवान ने बताया, स्मैक के नशे के बाद एक दो दिनों तक दिमाग सुन्न रहता है। न भूख लगती है और न किसी तरह का कोई दर्द महसूस होता है। ऐसा प्रभाव डेंड्राइट या कफ सिरप में नहीं होता। दरअसल नशे की चंगुल में आए अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूर या छोटे मोटे काम करने वाले होते हैं। उनके पास इतने पैसे नहीं होते कि नशा मुक्ति केंद्र का खर्च उठा सकें। 28 वर्षीय बादल (बदला हुआ नाम) दो साल से पूरी तरह से स्मैक के नशे से दूर हैं।उनके मुताबिक, स्मैक का नशा उन लोगों को तुरंत चपेट में ले लेता है, जो लोग अपने परिवार से ज्यादा नजदीकी रिश्ते नहीं रखते।

जिला मुख्यालय में चल रहा है आठ नशा मुक्ति केन्द्र:

जिला मुख्यालय अररिया में आठ नशा मुक्ति केंद्र चल रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह की यहां संचालित सभी नशा केंद्र के संचालक पहले नशा के आदि थे। नशा छोड़ने के बाद नशा मुक्ति केंद्र चला रहे हैं। यही नहीं यहां काम करने वाले युवा भी इसी नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती होकर नशा छोड़ चुके हैं और फिर केंद्र में भर्ती मरीज को मोटिवेट करते हैं। हिन्दुस्तान ने जिला मुख्यालय के तीन नशा मुक्ति केन्द्र का जायजा लिया।जीरोमाइल स्थित शुद्धि फाउंडेशन द्वारा संचालित नशा मुक्ति केंद्र के संचालक ने बताया कि उनकी संस्था एक गैर-लाभकारी संस्था है जहां रहना तो नि:शुल्क है, लेकिन मरीज को दवाई का खर्च देना होता है।यहां पांच हजार रुपए प्रवेश शुल्क, पांच हजार रुपये जांच शुल्क और दवाइयों के लिए मासिक खर्च देना होता है।अररिया में संचालित अन्य नशा मुक्ति केंद्र भी लगभग यही मॉडल चल रहा है।अररिया जैसे पिछड़े इलाके में हर महीने तकरीबन सात से आठ हजार रुपए महीना खर्च करना किसी गरीब या निम्न मध्यवर्गीय वर्ग परिवार के लिए बहुत मुश्किल है।

सदर अस्पताल स्थित नशा मुक्ति केन्द्र में नहीं है मनोचिकित्सक:

ऐसा नहीं है कि सरकारी नशा मुक्ति केंद्र अररिया में नहीं है। अररिया सदर अस्पताल में वर्ष 2016 से ही नशा मुक्ति केंद्र संचालित है। लेकिन अररिया सदर अस्पताल में 2016 से ही मनोचिकित्सक का पद खाली है। सदर अस्पताल में नशा मुक्ति केंद्र का संचालन मनोवैज्ञानिक शुभम कुमार करते हैं।हिदुस्तान ने सदर अस्पताल स्थित नशा मुक्ति केन्द्र का जायजा लिया।यहां मनोवैज्ञानिक शुभम कुमार ने बताया कि अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 तक सात मरीज भर्ती हुवा था। जबकि ओपीडी में 89 मरीज को देखा गया है।इस वर्ष अप्रैल माह में एक मरीज भर्ती था।चूंकि मनोचिकित्सक के नहीं रहने की वजह से यहां मरीज को महज चार से पांच दिन रखा जाता है।जबकि प्राइवेट नशा मुक्ति केंद्र में मरीज को मिनिमम चार महीने रखा जाता है।

ड्रग्स एडिक्शन का इलाज पूरी तरह से है संभव: मनोचिकित्सक

पूर्णिया मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के एचओडी मनोचिकित्सक डॉ नायाब अंजुम ने कहा कि युवाओं के बीच तेजी से बढ़ती नशे की प्रवृत्ति अब गंभीर सामाजिक और मानसिक चुनौती बनती जा रही है। स्मैक, गांजा,महुवा, कोडीन युक्त कफ सिरप, नशीले इंजेक्शन सीमांचल के जिलों में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार नशे की लत का शिकार ज्यादातर लोगों की कम उम्र में ही मौत हो जाती है। युवा व किशोर दोस्ती यारी में मजा के लिए स्मैक लेता है, जब एक बार वह इसके चंगुल में फंस जाता है तो उसके शरीर और दिमाग का नकारात्मक प्रतिक्रिया इतना खतरनाक हो जाता है कि इंसान इसके चंगुल से निकल नहीं पता है। उन्होंने कहा कि अब तो एविल में स्मैक मिक्स कर इंजेक्शन भी ले रहे हैं।डॉ नायाब अंजुम की माने तो नशा सिर्फ मर्द ही नहीं औरतें व कम उम्र की लड़कियां भी इंवॉल्व हो गई है।उन्होंने कहा कि सबसे खतरनाक गांजा का नशा होता है। गांजा पीने वाले ज्यादातर लोग सिजोफ्रेनियां नामक मानसिक रोग के शिकार हो जाते हैं।यही नहीं स्मैक, गांजा, कोडीन युक्त कफ सिरप के अलावा नशे के लिए पेंटाजोसिन, मोडोल, इंजेक्शन और स्पास्मो प्रोक्सीबॉन केप्सूल का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। 8 से 12 साल के बच्चों के बीच सनफिक्स का प्रचलन बढ़ा है।इसका गहरा साइड इफेक्ट है।सनफिक्स लेने वालों का पोटैशियम लेबल काम हो जाता है और हार्ट अटैक होने से मौत होने की संभावना बढ़ जाती है। मनोचिकित्सक डॉक्टर नायाब अंजुम की माने तो स्मैक या दूसरे ड्रग एडिक्शन का इलाज पूरी तरह से संभव है। इसके लिए संकल्प लेना होगा और नियमित दवा का सेवन करना होगा।उन्होंने कहा कि नशा पर अंकुश लगाने के लिए बगैर डॉक्टर के प्रिपकेप्सन के नशीली दवा बेचने वालों पर प्रहार करना होगा।सरकारी स्कूल-कॉलेजों, कोचिंग संस्थानों में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि नशे के खिलाफ केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा,तभी युवा पीढ़ी को इस दलदल में जाने से रोका जा सकेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अररिया में नशा मुक्ति केंद्र कितने हैं?
जिला मुख्यालय अररिया में आठ नशा मुक्ति केंद्र चल रहा है।

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