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27 नवंबर, 2020|10:59|IST

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जिले के तीन सियासी घरानों की प्रतिष्ठा एक बार फिर दांव पर

जिले के तीन सियासी घरानों की प्रतिष्ठा एक बार फिर दांव पर

1 / 4जिले की राजनीति खासकर मुस्लिम राजनीति में दशकों से अपना दबदबा बरकरार रखने वाले तीन सियासी घरानों के योद्धा एक बार फिर से चुनावी समर में कूद चुके हैं। इस बार एक अंतर ये है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र...

जिले के तीन सियासी घरानों की प्रतिष्ठा एक बार फिर दांव पर

2 / 4जिले की राजनीति खासकर मुस्लिम राजनीति में दशकों से अपना दबदबा बरकरार रखने वाले तीन सियासी घरानों के योद्धा एक बार फिर से चुनावी समर में कूद चुके हैं। इस बार एक अंतर ये है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र...

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3 / 4जिले की राजनीति खासकर मुस्लिम राजनीति में दशकों से अपना दबदबा बरकरार रखने वाले तीन सियासी घरानों के योद्धा एक बार फिर से चुनावी समर में कूद चुके हैं। इस बार एक अंतर ये है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र...

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4 / 4जिले की राजनीति खासकर मुस्लिम राजनीति में दशकों से अपना दबदबा बरकरार रखने वाले तीन सियासी घरानों के योद्धा एक बार फिर से चुनावी समर में कूद चुके हैं। इस बार एक अंतर ये है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र...

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जिले की राजनीति खासकर मुस्लिम राजनीति में दशकों से अपना दबदबा बरकरार रखने वाले तीन सियासी घरानों के योद्धा एक बार फिर से चुनावी समर में कूद चुके हैं। इस बार एक अंतर ये है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र अररिया से दो अलग घरानों का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार आमने-सामने हैं। जबकि जोकीहाट विधानसभा सीट से तीसरे घराने के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। आजादी के बाद से जिले में हुए चुनाव के इतिहास पर नजर डालने से ये स्पष्ट होता है कि जिले की मुस्लिम राजनीति में सबसे पहले स्व. हाजी जियाउर रहमान परिवार ने पदार्पण किया था। खुद उन्होंने अररिया विधानसभा से 1952 और 1957 के चुनाव में जीत दर्ज की थी।

इंदिरा गांधी के करीबियों में से थे जमीलूर रहमान: जियाउर रहमान के बाद उनके सगे भतीजे अधिवक्ता जमीलूर रहमान ने राजनीतिक विरासत संभाली। वे 70 के दशक में कई बार किशनगंज लोकसभा से सांसद निर्वाचित हुए। बताया जाता है कि श्री रहमान कांग्रेस में काफी रसूख रखते थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी नेताओं में से एक थे। जमीलूर रहमान के सांसद रहते ही जियाउर रहमान के बेटे मोइदुर रहमान ने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर जोकीहाट विधानसभा से दो बार 1980 और 1990 में चुनाव जीते। वे राज्य सरकार में मंत्री भी बने। हालांकि इसके बाद भी उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन सफल नहीं हुए। कुछ साल पहले उनका निधन हुआ। लेकिन परिवार का राजनीतिक सफर जारी है। वर्ष 2015 के चुनाव में मोइदुर रहमान का बेटा आबिदुर रहमान कांग्रेस का टिकट पाने में सफल रहे और अररिया विधानसभा से निर्वाचित हुए। इस बार भी वे कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। दिलचस्प ये है कि इस बार उनके सामने अजीमुद्दीन परिवार की बहू व जिला परिषद की पूर्व अध्यक्ष शगुफ्ता अजीम जदयू प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं।

शगुफ्ता अजीम और उनके पति लंबे समय से पंचायती राज की राजनीति से जुड़े हैं। अभी उनके पति जिला परिषद के अध्यक्ष हैं। इसके पहले शगुफ्ता दो टर्म खुद जिप अध्यक्ष रह चुकी हैं। पूर्व में सिकटी विधानसभा से कांग्रेस टिकट पर चुनाव भी लड़ चुकी हैं। उनके ससुर अजीमुद्दीन कई बार पलासी व सिकटी का प्रतिनिधित्व विधानसभा में कर चुके थे। राज्य सरकार में मंत्री के ओहदे पर भी रहे। फिर बाद में एमएलसी भी बने। जिले की सियासत में जिस तीसरे मुस्लिम घराने का दबदबा रहा है वो स्वर्गीय सांसद व कद्दावर नेता तस्लीमुद्दीन का है। अलग-अलग चुनाव में जीत हासिल कर उन्होंने लोकसभा में पूर्णिया, किशनगंज व अररिया का प्रतिनिधित्व किया। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री भी बने। उन्होंने 1969 में पहली बार जोकीहाट से चुनाव लड़ा और एमएलए निर्वाचित हुए। वे जोकीहाट से चार और अररिया विधानसभा क्षेत्र से एक बार निर्वाचित हुए। सांसद बनने के बाद उनका पुत्र सरफराज आलम ने जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व शुरू किया। वे 2000, 2010 और 2015 का विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। यहीं नहीं बल्कि पिता के निधन बाद अररिया लोकसभा की रिक्त सीट के लिए हुए उप चुनाव में श्री आलम राजद की टिकट पर चुनाव जीते। लेकिन बाद में हुए आम चुनाव में उन्हें बीजेपी प्रत्याशी प्रदीप सिंह के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा। उधर श्री आलम के सांसद निर्वाचित होने के बाद जोकीहाट की रिक्त सीट पर जो उप चुनाव हुआ उसमें भी राजद ने तस्लीमुद्दीन परिवार पर भी भरोसा जताया। उप चुनाव में राजद ने तस्लीमुद्दीन के छोटे पुत्र मो शाहनवाज को उम्मीदवार बनाया। वो भी चुनाव जीत कर विधायक बन गए।

हालांकि इस बार टिकट के लिए परिवार के बीच काफी खींच तान हुई, लेकिन निवर्तमान विधायक शाहनवाज टिकट लेने में नाकाम रहे। टिकट एक बार फिर बड़े भाई सरफराज आलम को मिल गया है। ऐसा नहीं है कि इन तीनों सियासी घरानों के बाहर के उम्मीदवार चुनाव नहीं जीते हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम रही है। जाकिर हुसैन खान दो बार विधायक बने। वहीं जोकीहाट क्षेत्र से ही जदयू प्रत्याशी मंजर आलम ने सरफराज आलम को 2005 में हुए विधानसभा के दोनों चुनाव में पराजित किया था। जबकि मो हलीमुद्दीन और सोशलिस्ट नेता मो आजम भी पूर्व में एक एक बार विधायक बनने में सफल रहे थे।

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  • Web Title:The reputation of three political houses in the district once again at stake