डेढ़ हजार महादलितों की किसी ने नहीं ली सुधि, आश्वासन धरा का धरा
फारबिसगंज के अंबेडकर कॉलोनी में सड़क, पीने का पानी और सुगम रास्ते की कमी है। यहाँ की महिलाएं चुनावी वादों के प्रति निराश हैं। रेलवे पटरी ही एकमात्र रास्ता है, जो हादसे का खतरा बन गया है। प्रशासन ने समस्याओं का समाधान करने का आश्वासन दिया है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

हाल फारबिसगंज नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 09 स्थित अंबेडकर कॉलोनी का न सड़क, न पीने का शुद्ध पानी, न ही कोई सुगम रास्ता रेलवे पटरी होकर गुजरते हैं स्कूल बच्चे व अन्य फारबिसगंज, निज संवाददाता देखते ही देखते चुनाव आ गया। प्रचार प्रसार की उल्टी गिनती शुरू हो गयी मगर नहीं मिली अंबेडकर कॉलोनी वासियों को सुकून। नेताओं का वादा, प्रशासन का भरोसा सब धरा का धरा रह गया। फारबिसगंज नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 09 स्थित अंबेडकर कॉलोनी में करीब डेढ़ हजार से अधिक की आबादी वाले महादलित समुदाय का जीवन नारकीय हालात में गुजर रहा है।
शहर के बीचोंबीच बसी यह बस्ती आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। न सड़क है, न पीने का शुद्ध पानी, ना ही कोई सुगम रास्ता—रेलवे पटरी ही यहां के लोगों के लिए जीवन का एकमात्र रास्ता बन चुकी है। कॉलोनी की महिलाएं रेखा देवी, सीता देवी और गुड़िया देवी कहती हैं — सरकार और नेता हमारे नाम पर वोट तो मांगते हैं, लेकिन हमारी जिंदगी की हकीकत कोई देखने नहीं आता। न सड़क है, न नल का पानी, बस झूठे वादे हैं। करीब 77 लाख रुपए की लागत से हर घर नल का जल योजना के तहत जल मीनार तो खड़ा कर दिया गया, मगर किसी भी घर तक ठीक से पानी नहीं पहुंचा। मीनार सिर्फ दिखावे के लिए बना है। आवास योजना भी अधूरी हकीकत करीब 25-30 वर्ष पूर्व जो मकान सरकार ने दिए थे, वे अब जर्जर होकर टूटने के कगार पर हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ से भी अछूता है यह कॉलोनी। कॉलोनी में चल रहा आंगनबाड़ी केंद्र भी एक खंडहरनुमा मकान में चलता है। पीड़ीत वस्ती निवासी कहते हैं कि बंद रास्ते ने बढ़ाई मुश्किलें। रेलवे ट्रैक के किनारे स्थित इस कॉलोनी का एकमात्र रास्ता बिजली कार्यालय के बगल से था, लेकिन प्रशासन ने उसे भी बंद कर दिया। अब कॉलोनीवासी किसी निजी गली या काउंटर से निकलने को मजबूर हैं। बीमार पड़ने पर एंबुलेंस तक नहीं आ सकती। लोगों को गोद में उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। कहते हैं कि रेल पटरी से होकर गुजरना अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। ग्रामीण कहते हैं कि बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग—सब इसी रास्ते से आवाजाही करते हैं। मगर यही पटरी उनकी जिंदगी के लिए खतरा भी है। कब कौन सी ट्रेन आए, कुछ पता नहीं। हादसे का डर हमेशा बना रहता है। कहने को तो पूरा क्षेत्र ओडीएफ घोषित है, लेकिन हकीकत में यहां के लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं। रेलवे किनारे झाड़ियों में ही लोग शौच जाते हैं। पूछने पर महिलाओं का दर्द छलक पड़ता है। कहते बैन की दूसरों के मोहल्ले को साफ रखने वाले वे लोग खुद गंदगी में जीने को मजबूर हैं। कहते हैं अधिकारी- फारबिसगंज एडीओ रंजीत कुमार रंजन कहते हैं अब महादलित समुदाय की सुविधाओं का ध्यान रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। रास्ते की समस्या को प्राथमिकता पर लिया जाएगा। सीओ के साथ स्थल निरीक्षण कर हर हाल में रास्ता का समाधान किया जाएगा। साथ ही नल-जल योजना के लिए पीएचईडी को नोटिस किया जाएगा। खास बात कि अंबेडकर कॉलोनी की ये तस्वीर बताती है कि विकास के वादों और सरकारी योजनाओं की चमक अभी तक यहां नहीं पहुंची है। चुनावी मौसम में यह सवाल गूंज रहा है — क्या इस बार भी वोट के बाद अंबेडकर कॉलोनी की आवाज पटरी की गड़गड़ाहट में दब जाएगी?
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