‘होली’ व ‘रेणु’ का रहा है गहरा ताल्लुकात, साथ मनेगी होली व रेणु जयंती

Mar 03, 2026 01:23 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, अररिया
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अररिया में होली और फणीश्वर नाथ रेणु की जयंती एक ही दिन मनाई जा रही है। रेणु ने होली पर कई कविताएँ लिखी थीं, जिनमें 'साजन! होली आई है' प्रमुख है। उनके जोगिरा में हास्य और सामाजिक विसंगतियों की सच्चाई छिपी है। आज भी रेणु जनपद में जोगिरा और होली गीत जीवित हैं।

‘होली’ व ‘रेणु’ का रहा है गहरा ताल्लुकात, साथ मनेगी होली व रेणु जयंती

अररिया, वरीय संवाददाता ‘होली’ व ‘रेणु’ का गहरा ताल्लुकात रहा है। आखिर हो भी क्यों नहीं अमर कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु होली से सबंधित कविता से ही तो अपनी साहित्यिक सफर की शुरूआत की थी। संयोग से इस बार रंगोत्सव होली व रेणु जयंती एक ही दिन (चार मार्च) है, इसलिए इस पर चर्चा करनी प्रासंगिक होगी। रेणु जी की पहली कविता थी..साजन! होली आई है। शीर्षक भी यही था। एक बानगी-साजन! होली आई है..सुख से हंसना जी भर गाना, मस्ती से मन को बहलाना..पर्व हो गया आज-साजन होली आई है! हंसाने हमको आई है! हालांकि इसके बाद रेणु जी कहानी व फिर उपन्यास लिखने लगे।

रेणु के छोटे बेटे साहित्यकार दक्षिणेश्वर राय पप्पू ने बताया कि होली पर रेणु जी की चार कविताएं उनक दिनों काफी मशहूर भी हुई थी-होली, मंगरू मियां के नए जोगिरे, धमार फगुआ तथा यह फागुनी हवा। रेणु की ‘होली’ में दुख—सुख का मिश्रित रंग है। फागोत्सव का प्राकृतिक पुट के साथ देशभक्ति पुट भी है। पप्पू बताते हैं कि 17 वर्ष की आयु में बाबू जी तुकबंदी व कविता लिखनी शुरू कर दी थी। 1938-1942 के बीच उन्होंने कई कविताएं लिखे थे। इसमें होली के भी कई गीत शामिल थे। हालांकि कई कविताएं बाद में प्रकाशित हुई। 1950 में ‘नई दिशा’ नामक पत्रिका में प्रकाशित ‘मगरू मियां नए जोगिरे’ में रेणु ने तत्कालीन सरकार पर चोट किया था। देखिए एक झलक ‘ एक रात में महल बनाया, दूसरे दिन फुलवारी, तीसरी रात में मोटर मारा, जिनगी सुफल हमारी, ...का टिकट कटाया बनकर खद्दरधारी, मोरंग की सीमा पर हमने रात में पलथी मारी। बाप हमारा पुलिस सिपाही, बेटा है पटवारी, हाल साल में बना सुराजी, तीनों पुस्त सुधारी। खादी पहनो चांदी काटो, रहे हाथ में झोली, दिनदहाड़े करो डकैती, बोल सुदेशी बोली... जोगिरा सर्र..र..र। ’ ‘बुरा न मानो होली है’ के बहाने भ्रष्टाचारियों पर की चोट: प्रतिष्ठित नागार्जुन पुरस्कार से सम्मानित 92 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार भोला पंडित ‘प्रणयी’ कहते हैं कि होली के अवसर पर गाए जाने वाले जोगिरा के माध्यम से रेणु जी ने विरोधियों, भ्रष्टाचारियों आदि की कलई खोलते नजर आए हंै। ‘बुरा न मानो होली है’ के बहाने ऐसे लोगों की खबर लेने की पुरानी परिपाटी है ओर सच कहूं तो रेणु जी ने इस परिपाटी का ईमानदारी से पालन भी किये हैं। रेणु जनपद की होली व रेणु जी के जोगिरा से प्रभावित होकर अमेरिका के टैक्सास निवासी व आस्ट्रेलिया के ला टार्बे यूनिवर्सिटी के हिंदी के एचओडी प्रो. इयान वुलफोर्ड होली में कई बार ओराही हिंगना आ चुके हैं। आम लोगों के साथ-साथ पशुओं के साथ भी वे होली खेल चुके हैं। रेणु जनपद में आज भी जीवंत है जोगिरा व होली गीत: आधुनिकता के इस दौर में विलुप्त होती जा रही होली गीत व जोगिरा यदि कहीं जीवंत है तो वह रेणु जनपद है। होली के मौके पर इस जनपद खासकर रेणु गांव औराही हिंगना में आज भी लोग जोगिरा गाते व थिरकते मिल जाएंगे। लेकिन इसकी संख्या अब काफी कम रह गयी है। खास बात यह कि यह अधिकांश जोगिरा रेणु जी के ही रचित होते हैं। इसमें हास्य—व्यंग्य के साथ सामाजिक विसंगतियों की कटु सच्चाई भी छिपी है। एक बानगी- बरसा में गड्ढे जब भर जाते हैं चर... बैंग हज़ारों उसमें करते हैं टर्र... वैसे ही राज आज ...का है...लीडर बने हैं सभी कल के गीदड़....जोगी जी सरर..र..र। मित्रों की टोलियों के साथ रेणु खुद गाते थे गोगिरा: रेणु के बड़े बेटे और फारबिसगंज के पूर्व विधायक पद्मपराग राय बेणु ने बताया कि बाबू जी अपनी मित्रों की टोलियों के साथ अपनी गीत पर खुद जोगिरा गाते थे। .....होरिया आई रे आई रे होरिया आई रे...गावत गांधी राग मनोहर,चरखा चलावे बाबू राजेन्दर, गुंजल भारत में अमराई रे....होरिया आई रे आईं रे होरिया आई रे होलिया आई रे। वीर जमाहिर शान हमारो, बल्लभ है अभिमान हमारो, जय प्रकाश जय शोभाई रे, होरिया आई रे आई रे होरिया आई रे....। जोगी जी ताल न टूटे,जोगी जी ताल न टूटे, तीन ताल पर ढोलक बाजे, ताक धिना धिन धिन्नक धिन्ना ताक धिना धिन धिन्नक धिन्ना। होली है भाई होली है,बुरा न मानो होली है। ....चरखा काटो खद्दर पहनो रहे हाथ में झोली,चरखा काटो खद्दर पहनो रहे हाथ में झोली, दिन दहाड़े करो डकैती बोल सुराजी बोली जोगिरा सररररर.।

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