
लोगों की आंखों से ओझल हुआ फारबिसगंज का ऐतिहासिक ब्रिटिश कालीन काली मेला
फारबिसगंज का ऐतिहासिक काली मेला, जो सवा सौ साल पुराना है, अब लोगों की यादों में सिमट गया है। धर्मेंद्र की अधूरी फिल्म ‘डॉक्टर बाबू’ के दृश्य इसी मेले पर आधारित थे। अब मेला नहीं लगता और धर्मेंद्र के निधन ने लोगों के जज़्बातों को और गहरा कर दिया है। यह मेला अब सिर्फ याद बनकर रह गया है।
फारबिसगंज, निज संवाददाता। सवा सौ साल पुराना ब्रिटिश कालीन फारबिसगंज का ऐतिहासिक काली मेला अब लोगों की आंखों से ओझल हो चुका है। अमर कथाकार फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ ने अपनी कई कृतियों में जिसकी झलक दिखाई, वही मेला अब बीते दिनों की याद बनकर रह गया है। पिछले एक दशक से अधिक समय से न लगने वाले इस मेले को लेकर लोगों की पीड़ा और भी गहरी हो गई है—क्योंकि धर्मेंद्र की अधूरी फिल्म ‘डॉग्डर बाबू’, जिसे रेणु की कहानियों पर बनाया जाना था, उसी काली मेले के दृश्यों को समेटने वाली थी। मगर न फिल्म बन सकी, न मेला ही बच पाया।
और अब दिसंबर में मेला लगने से ठीक पहले ही-मैन धर्मेंद्र के निधन ने लोगों की भावनाओं को और ज्यादा झकझोर दिया है। जानकर बताते हैं कि सवा सौ साल का इतिहास, जहां आस्था, व्यापार और उत्सव साथ-साथ चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर डेढ़ महीने तक चलने वाला यह मेला कभी बिहार-नेपाल सीमा का शान हुआ करता था। सोनपुर के बाद सबसे बड़ा पशु मेला, जहां हाथी, घोड़े, ऊंट, भैंस की खरीद-बिक्री होती थी। नेपाल के मोरंग, सुनसरी, सप्तरी जिलों से लेकर पूर्णिया और कोसी कमिश्नरी के लोग बड़ी तादाद में आया करते थे। चौक-चौराहों से लेकर यमपुरी, कुश्ती, नाटक, मौत का कुआँ, जादू, मीना बाजार और रातों में थिएटर, सिनेमा, सर्कस—सब मिलकर पूरा शहर मेला बन जाता था। बुजुर्ग आज भी बताते हैं, पहले पूरा फारबिसगंज मेला बन जाता था क्योंकि दुकानें, सिनेमा हॉल, हर चीज मेला मैदान में शिफ्ट हो जाती थी। और उसी भीड़भाड़, उसी सांस्कृतिक उफान में रेणु की कहानियों की जीवन्त बारीकियां झलकती थीं। काली मेले में होनी थी ‘डॉग्डर बाबू’ की शूटिंग: रेणु की कहानियों पर बनने वाली धर्मेंद्र की फिल्म ‘डॉक्टर बाबू’ के कई दृश्यों के लिए फारबिसगंज के काली मेले का चयन किया गया था। यह वही मेला था, जहां ग्रामीण संस्कृति के रंग, थारू समुदाय की भीड़,देहाती बाजारों की रौनक, पशुओं की आवाजाही,रात का थियेटर सब मिलकर रेणु की कथाओं का सजीव संसार बनाते थे। यही वजह था कि फिल्म यूनिट ने पहले यहाँ विजिट भी किया था, लोकेशन तय हुई थी, और काली मेले का दृश्य फिल्म की आत्मा माना गया था। मगर किस्मत ने साथ नहीं दिया—फिल्म अधूरी रह गई। अब जब दिसंबर में मेला लगने की उम्मीद बंधी ही थी, उसी बीच धर्मेंद्र के निधन की खबर ने लोगों को अंदर तक छू लिया। स्थानीय लोग कह रहे हैं—धर्मेंद्र के साथ रेणु भी जुड़ जाते थे, और रेणु के साथ हमारा काली मेला। जैसे एक साथ तीन यादें बुझ गई हों। ठेकेदारी प्रथा, प्रशासनिक उलझनें ने खत्म किया मेला: दशकों पहले तक इस मेले का पूरा प्रबंधन प्रशासन के हाथ में था। फिर शुरू हुई ठेकेदारी प्रथा, और यहीं से कमजोरी की हुई शुरुआत । ठेकेदार और प्रशासन के बीच टकराव- बढ़ते अपराध,थिएटर पर पाबंदियां,पुलिस की सख्त निगरानी अनुमति न मिलने से ठेकेदारों का पीछे हटना मेला उजड़ने का भी कारण बना। 2014 में पुलिस ने थिएटर को अनुमति देना बंद किया, जिसके बाद भारी घाटा उठाकर ठेकेदार पीछे हटते गए। और वह मेला, जो कभी दिसंबर के पूरे महीने उफान पर रहता था—आज खानापूर्ति भर की याद बनकर बैठ गया है। अब तो स्थिति यह है कि मेला मैदान पर इंडोर स्टेडियम बन चुका है और काली मेला अपने अस्तित्व के लिए छड़पटा रहा है। नेपाल के थारू कभी था मेले की शान- थारू समुदाय की भारी भीड़ मेले की खास पहचान हुआ करती थी। आज भी बुजुर्ग बताते हैं—थारू लोग जैसे इस मेले के प्राण थे। उनके आने से मेला सचमुच मेला लगता था। लिहाज मेला सिर्फ व्यापार नहीं था—यह सभ्यता, संस्कृति,सामाजिकता और सीमापार का लोक-संबंध सबको जोड़ने वाला केंद्र था। क्या कहती हैं मुख्य पार्षद: नगर परिषद की मुख्य पार्षद वीणा देवी ने कहना है कि फारबिसगंज का ऐतिहासिक काली मेला सिर्फ परंपरा नहीं है, नगर परिषद का अधिकार भी था। प्रशासनिक हस्तक्षेप से नगर परिषद को भारी राजस्व हानि हुई है। इस बार हम मेला लगाने के लिए प्रशासन से बातचीत कर रहे हैं। यूं तो मेला नहीं लगने का टीस आम है मगर धर्मेंद्र के निधन के बाद लोगों की भावनाएं और भी तीव्र हो गई हैं। कल का ऐतिहासिक मेला अब इंडोर स्टेडियम में तब्दील हो गयी है।

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