
बंद बनमनखी चीनी मिल चालू होने से अररिया के भी किसानों के दिन बहुरंगे
रानीगंज में मंगलवार को बिहार का बजट पेश किया जाएगा, जिसमें चीनी मिल के पुनः खुलने की उम्मीदें हैं। बनमनखी चीनी मिल के बंद होने से क्षेत्र के गन्ना उत्पादक किसान संकट में थे। बजट में मिल के पुनः शुरू होने से किसानों को राहत मिलने की संभावना है, जिससे गन्ना उत्पादन फिर से शुरू हो सकता है।
रानीगंज। एक संवाददाता। मंगलवार को बिहार बजट पेश किया जाएगा। चीनी मिल की खुलने व राशि आवंटित होने की उम्मीदें जगी है। इस कारण रानीगंज क्षेत्र के तत्कालीन गन्ना उत्पादक किसान खुश नजर आ रहे हैं। यहां बता दें कि रानीगंज से जुड़े सीमावर्ती पूर्णिया जिले के बनमनखी में चीनी मिल बंद होने के बाद से ही यहां से धीरे-धीरे गन्ने की मिठास ही गायब हो गयी थी। लेकिन अब बजट में चीनी मिलों में दोबारा शुरू करने की उम्मीदें जगी है। बनमनखी का चीनी मिल खुलने से क्षेत्र के किसानों के दिन बहुरंगे होंगे। बनमनखी का चीनी मिल बंद होने के बाद लोग अपने खेतों में गन्ना की जगह धान- गेहूं, मक्का सहित अन्य दूसरी फसल लगाने को बाध्य हो रहे थे।
हालांकि रानीगंज के खरसायी, धामा, परिहारी आदि पंचायतों के एकाध किसान गन्ने की थोड़ी बहुत खेती करते हैं। लेकिन उनकी हालत अच्छी नहीं है। बोले क्षेत्र के किसान: रानीगंज के किसान आरिफ, प्रशांत सिंह, अमर सिंह, चंदन यादव, आदि बताते है कि बनमनखी का चीनी मिल बंद होने के बाद अब गन्ने खरीददारी करने वाला कोई नहीं होने के कारण गन्ने की खेती करना ही छोड़ दिये। लेकिन यदि बनमनखी का चीनी मिल चालू होता है तो यहां के किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। रानीगंज क्षेत्र की मिट्टी गन्ने उत्पादन के लिए काफी उपजाऊ (मुफीद) मानी जाती है। यदि मिल चालू होती है तो क्षेत्रवासियों के लिये गन्ने के रस का स्वाद अब फिर से मिलने लगेगा। - कभी बड़े पैमाने पर होती थी गन्ने की खेती : जानकार बताते हैं कि अररिया आरएस, धामा, बसैटी, पहुंसरा, परिहारी, कोशकापुर, सहित जिले के विभिन्न गांव में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी। अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह से किसान अपने गन्ने की पेराई कर गुड़ बनाना शुरू कर देते थे। यह कार्य मार्च तक चलता था। 1990 के दशक में अररिया आरएस, धामा, बसेटी, पहुंसरा, सहित अन्य कई पंचायतों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी। नवम्बर माह के अंतिम सप्ताह से किसान अपने गन्ने की पेराई कर गुड़ बनाना शुरू कर देते थे। गन्ना पेराई का काम मार्च के अंतिम सप्ताह तक चलता था। तीन चार दशक पहले रानीगंज के कई जगहों पर मशीन से गन्ने कस कर गन्ने के रस से छुआ गुड़, शक्कर आदि बनता था। अररिया आरएस का मंडी कभी गुड़ की मिठास की सौंधी सुगंध से महकता रहता था। बनमनखी चीनी मिल में 60-70 फीसद होती थी गन्ने की खपत: जिले के किसानों की तरक्की और युवाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से 1960 के दशक में करीब करोड़ो की लागत से बनमनखी चीनी मिल बना था। यह चीनी मिल भारत की सबसे बड़ी चीनी मिल में एक था। मिल की क्षमता प्रतिदिन हजारों कुंटल चीनी उत्पादन की थी। सरकारी उदासीनता के कारण बनमनखी का चीनी मिल साल 1997 में बंद हो गयी। लेकिन 2026 के बजट में बिहार के चीनी मिल को दोबारा शुरू करने की उम्मीदें जगी है।

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