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कॉपी के अभाव में विवि में कई परीक्षाएं लंबित

हिन्दुस्तान टीम,आराNewswrap
Sat, 04 Dec 2021 08:00 PM
कॉपी के अभाव में विवि में कई परीक्षाएं लंबित

पहले कोरोना के कारण परीक्षाएं प्रभावित हुईं और अब कॉपी के अभाव में

कॉपी खरीद में गड़बडी का मुद्दा उठने व कार्रवाई के बाद नहीं हो रही पहल

आरा। निज प्रतिनिधि

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय (वीकेएसयू) में कॉपियों की खरीद नहीं होने से कई महत्वपूर्ण परीक्षाएं अटकी हैं। पहले कोरोना के कारण परीक्षाएं प्रभावित हुईं। अब कॉपी के अभाव में परेशानी हो रही है। इनमें अधिकतर परीक्षाएं यूजी स्तर की हैं। पीजी, स्नातक पार्ट वन, पार्ट थर्ड समेत कई अन्य वोकेशनल व कोर्स की परीक्षाएं लंबित हैं। जो परीक्षाएं लंबित हैं, उनमें साल भर या इससे ज्यादा का सत्र देरी से चल रहा है। इन परीक्षाओं में आठ से दस लाख से ज्यादा कॉपियों की जरूरत होगी। हाल में पीजी और पार्ट टू की प्रायोगिक परीक्षा कराने के लिए किसी तरह कॉपियों की खरीद की गई। अब इतनी भी कॉपी नहीं बची है कि यूजी की परीक्षाएं हो सकें। कॉपी नहीं रहने के कारण ही स्नातक पार्ट वन के सत्र 2020-23 की परीक्षा का प्रोग्राम घोषित नहीं हो पा रहा। मालूम हो कि पार्ट वन का परीक्षा फॉर्म भरने की तिथि कई बार बढ़ाई जा चुकी है। फिलहाल सात दिसंबर तक फॉर्म भरने की अंतिम तिथि है। इसके अलावा स्नातक पार्ट थर्ड सत्र 2018-21 की परीक्षा जल्द ही ली जानी है। हालांकि इसका परीक्षा फॉर्म अभी नहीं भराया गया है।

परीक्षा विभाग का चक्कर लगा रहे छात्र

सत्र देरी होने के कारण छात्र-छात्राएं लगातार विश्वविद्यालय पहुंच रहे हैं। परीक्षा विभाग जाकर परीक्षा की तिथि पूछते हैं, किंतु कॉपी नहीं रहने के कारण कोई भी अधिकारी इस मामले में कुछ भी बोलने से बचते रहते हैं। कॉपी की खरीद को लेकर मौजूदा प्रभारी कुलपति को ही निर्णय लेना है। बताया जाता है कि टेंडर या जेम पोर्टल आदि से खरीदारी राजभवन से चर्चा कर की जा सकती है। हालांकि कुछ विवि में कॉपी खरीद में गड़बड़ी के मामले उजागर होने के बाद वर्तमान हालात को देख कोई निर्णय नहीं लिया जा रहा। लिहाजा, मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। परीक्षाएं लंबित हैं।

क्रय-विक्रय कमेटी में मुद्दा रख हो सकती है खरीद

विवि से जुड़े जानकारों के अनुसार कॉपी की खरीदारी का मुद्दा क्रय-विक्रय और वित्त समिति की बैठक में रख निर्णय लिया जा सकता है। हालांकि किस प्रक्रिया से कॉपी खरीद होगी, इस पर निर्णय लेने को फिलहाल सुगबुगाहट भी नहीं दिख रही, ताकि सही प्रक्रिया के तहत कॉपी की खरीद हो सके। कॉपी खरीद पर कोई निर्णय नहीं लिए जाने का मुख्य कारण हाल में निगरानी की मगध यूनिवर्सिटी में हुई कार्रवाई बताई जा रही है। साथ ही दूसरा कारण वीर कुंवर सिंह विवि में भी विगत वर्ष ओएमआर और कॉपी की खरीद पर उठे सवाल को बताया जा रहा है। कॉपी की हुई खरीदारी औऱ तत्कालीन कुलपति प्रो राजेंद्र प्रसाद के कार्यकाल में एजेंसी को हुए भुगतान के बाद उठ रहे सवाल के बाद सभी चुप्पी साधे हुए हैं। वीर कुंवर सिंह विवि में परीक्षा विभाग से संबंधित कॉपी और ओएमआर खरीद का भुगतान आपूर्तिकर्ता को किया गया है। लगभग एक करोड़ 33 लाख का भुगतान ऐसा है, जिस पर निवर्तमान वीसी प्रो देवी प्रसाद तिवारी ने रोक लगा दी थी। सूत्रों की मानें तो भुगतान तत्कालीन कुलपति प्रो राजेंद्र प्रसाद के कार्यकाल में हुआ है।

एसवीयू ने वीकेएसयू से भी कॉपी खरीद की मांगी है जानकारी

मगध विश्वविद्यालय में उत्तर पुस्तिका की खरीद में अनियमितता पाए जाने के बाद अन्य विश्वविद्यालयों में भी उत्तर पुस्तिकाओं की खरीद की जांच होनी है। स्पेशल विजिलेंस यूनिट (एसवीयू) ने राज्य के विश्वविद्यालयों में कॉपियों की खरीद प्रक्रिया का पूरा ब्योरा मांगा है। वीर कुंवर सिंह विवि से भी कई प्रकार की जानकारी मांगी गई है। एसवीयू के पुलिस अधीक्षक जेपी मिश्रा की ओर से भेजे पत्र के अनुसार सभी को मूल रिकॉर्ड की जानकारी के साथ सक्षम व्यक्ति की ओर से 27 दिसंबर तक पूरा ब्योरा उपलब्ध कराना है। विवि से जनवरी 2019 से अब तक परीक्षा/विश्वविद्यालय से संबंधित कॉपी की थोक खरीद और कुल संख्या सहित अन्य विवरणों की जानकारी मांगी गई है। टेंडर प्रक्रिया की जानकारी भी देने को कहा गया है। इसके अलावा कुल ओएमआर शीट और प्रति ओएमआर शीट की दर के साथ-साथ आपूर्तिकर्ताओं/एजेंसियों के साथ समझौते की प्रति भी मांगी गई है। वहीं, एमयू वीसी राजेंद्र प्रसाद के खिलाफ जांच के संदर्भ में जानकारी मांगी गई है। कॉपी की खरीद नहीं होने का एक कारण यह भी बताया जा रहा है।

मिली हैं अनियमितता की शिकायतें

कॉपी खरीद में खेल उजागर होने के बाद एसयूवी को कई तरह की शिकायतें मिल रही हैं। हाल ही में मौलाना मजहरूल हक अरबी-फारसी विवि कुलपति ने भी कॉपी खरीद में गड़बड़ी का मसला उठाया है। अन्य विश्वविद्यालयों में शिकायत मिली है कि स्थापित वित्तीय मानदंडों का उल्लंघन कर खर्च किया गया है। ऑडिटिंग और जांच की कमी के अलावा थोक अनुबंध देने की प्रवृत्ति भी देखने को मिली है। ज्यादातर विश्वविद्यालय की ओर से यूपी आधारित कंपनियों के एक विशेष समूह को उत्तर पुस्तिका का ऑर्डर दिया गया है।

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