ट्रेंडिंग न्यूज़

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News बिहार आराजैन दर्शन में भावना का महत्वपूर्ण स्थान : जैन मुनि श्री सुप्रभसागर

जैन दर्शन में भावना का महत्वपूर्ण स्थान : जैन मुनि श्री सुप्रभसागर

फोटो 6 : आरा में दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में जैन मुनि श्री सुप्रभसागर का स्वागत करते...

जैन दर्शन में भावना का महत्वपूर्ण स्थान : जैन मुनि श्री सुप्रभसागर
हिन्दुस्तान टीम,आराTue, 28 May 2024 08:15 PM
ऐप पर पढ़ें

आरा। निज प्रतिनिधि
स्थानीय जेल रोड स्थित दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में प्रवास कर रहे दिगम्बर जैन मुनि श्री 108 सुप्रभसागर महाराज का प्रवचन हुआ। श्रद्धालुओं के बीच प्रवचन करते हुए कहा कि जैन दर्शन में भावना का महत्वपूर्ण स्थान है। जैन दर्शन में सोलह भावनाओं की चर्चा की गई है। इन भावनाओं को आत्मसात करके ही कोई साधक परम मुक्तावस्था को प्राप्त कर सकता है। दर्शन विशुद्धि भावना प्रथम भावना है। सो, सम्यक् दर्शन और दर्शन विशुद्धि में तत्वतः कोई अंतर नहीं है। जैन दर्शन के अनुसार मात्सर्य या ईर्ष्या एक दोष है, जो मनुष्य को अन्य लोगों की सफलता या सुख को देखकर होता है। इस दोष के कारण व्यक्ति अपने भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और दूसरों को बुरा भला कहने लगता है। इससे न केवल उस व्यक्ति का अहंकार बढ़ता है, बल्कि उसके द्वारा दूसरों के लिए जो निर्माणकारी भावनाएं होती हैं, उनका नाश हो जाता है। जैन धर्म में मात्सर्य को एक महत्वपूर्ण दोष माना जाता है, जो व्यक्ति के आत्मा को अधिकारियों और अन्य लोगों के द्वारा दुखी करता है। इसलिए, जैन धर्म में लोगों को इस दोष से बचना चाहिए तथा दूसरों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि मुनिश्री का प्रवचन सुबह आठ बजे से, आहारचर्या 10 बजे तथा संध्या 4:30 बजे से शंका समाधान का कार्यक्रम होता है।

यह हिन्दुस्तान अखबार की ऑटेमेटेड न्यूज फीड है, इसे लाइव हिन्दुस्तान की टीम ने संपादित नहीं किया है।