
बिहार में भी केजरीवाल, कहकर AAP ने उतारे थे 99 उम्मीदवार, क्या हाल रहा?
संक्षेप: बिहार में तीसरे विकल्प के रूप में उतरे प्रशांत किशोर की पार्टी भी खाता खोलने में कामयाब नहीं रही। बहुकोणीय मुकाबले में आम आदमी पार्टी ने भी अकेले ताल ठोकते हुए 99 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी के लिए परिणाम बेहद निराशाजनक रहे हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश और मोदी की जोड़ी के आगे सभी पस्त हो गए। एनडीए की आंधी में आरजेडी-कांग्रेस, लेफ्ट और वीआईपी का महागठबंधन नाक बचाने में भी कामयाब नहीं रहा। तीसरे विकल्प के रूप में उतरे प्रशांत किशोर की पार्टी भी खाता खोलने में कामयाब नहीं रही। बहुकोणीय मुकाबले में आम आदमी पार्टी ने भी अकेले ताल ठोकते हुए 99 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी के लिए परिणाम बेहद निराशाजनक रहे हैं।

अरविंद केजरीवाल की पार्टी एक भी सीट पर जीत तो दूर मुकाबले में भी नहीं दिखी। पार्टी को नोटा से भी कम वोट मिले हैं और लगभग सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के मुताबिक आम आदमी पार्टी को आधे फीसदी से भी कम वोट शेयर से संतोष करना पड़ा। बिहार में पड़े कुल वोट में से महज 0.30 फीसदी ही 'झाड़ू' को प्राप्त हुए। आप को बिहार में कुल 1 लाख 50 हजार 913 मतदाताओं पसंद किया।
आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन कितना निराशाजनक रहा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नोटा को 1.81 फीसदी लोगों ने चुना और बहुजन समाज पार्टी 1.62 फीसदी वोट शेयर के साथ एक सीट भी जीतने में कामयाब रही, जबकि पूरे चुनाव में उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं हुई थी। यूं तो आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल बिहार में प्रचार के लिए नहीं उतरे लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह, सोमनाथ भारती आदि ने काफी समय और ऊर्जा बिहार में दिया।
पार्टी ने लोकलुभावन वादों में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री ने बिहार में आकर प्रचार करते नहीं दिखे, जिस तरह वह गुजरात में लगातार दौरे कर रहे हैं, जबकि वहां चुनाव में काफी समय है। पार्टी ने 99 सीटों पर टिकट बांटकर मुख्यतौर पर उम्मीदवारों को उनके अपने प्रयास और सिंबल के भरोसे छोड़ दिया।





