
विपक्ष अगर भाजपा के इस अश्वमेध को रोकना चाहता है, तो उसे अपनी रीति-नीति में बदलाव करना होगा। पश्चिम बंगाल के नतीजों से साफ है कि घिसे-पिटे आरोपों और खोखली भावनात्मक दलीलों का जमाना लद चुका है। सटीक रणनीति, सांगठनिक एकजुटता, जनता से…

चुनाव आते ही हमारे नेता एक तरफ लोगों पर सरकारी खजाने से धन-वर्षा शुरू कर देते हैं, तो दूसरी तरफ अपनी अपूर्णताओं को छिपाने के लिए अनर्गल आलाप भर उठते हैं। वे नफरत बोते और घृणा काटते हैं…

मुंबई के उस घटनाक्रम ने कई महत्वपूर्ण सवालों को जन्म दे दिया है। हमारे देश में आए दिन राजनीतिक रैलियों, जनसभाओं, धार्मिक आयोजनों, बारातों और अति- महत्वपूर्ण लोगों की आवाजाही के कारण जाम लगता है। लोग इसे ‘अनिवार्य स्वाभाविक संकट’ मान बैठे हैं…

आज आधे से अधिक अमेरिकी युद्ध को नाजायज ठहराते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में ‘मागा’ समर्थक भी हैं। डोनाल्ड ट्रंप पर महाभियोग चलाने की मांग तक उठ रही है। ट्रंप के बचाव का अकेला रास्ता यही है कि ईरान से ऐसा समझौता हो जाए…

पाकिस्तान की अति-सक्रियता से हमारे आशंकाशास्त्रियों को लगता है कि वह इस प्रभाव का उपयोग कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए करेगा। मैं विनम्रतापूर्वक पूछना चाहूंगा, ऐसा उसने कब नहीं किया? आजादी के बाद से हम उसकी हर सियासी और सामरिक चाल से निपटते आए हैं…

वामपंथ, दक्षिण पंथ और मध्यमार्गी विचारों की यह सीधी लड़ाई चुनाव को खासा दिलचस्प बना रही है।... तय मानिए। इस चुनाव के नतीजों में जरा-सी हेरफेर समूचे देश की राजनीति की दशा-दिशा प्रभावित कर सकती है। मैं विनम्रतापूर्वक दोहराना चाहता हूं…

वियतनाम की किम फुक और मिनाब की बच्चियों के बीच का यह फर्क अनायास नहीं है। सोशल मीडिया के जरिये बरसों से भेड़ियों के समूह पाले और पोसे जा रहे हैं। तथाकथित राष्ट्रवाद और अतीत के अंधकूप में गुम अतिरंजित गाथाएं राजनीतिक सफलता का जरिया बन गई हैं…

पुराने जमाने के लोग क्या ध्वनि से परहेज करते थे? जी नहीं, वे भी ढोल, मंजीरे, मृदंगों और शंखों का इस्तेमाल करते थे। संस्कृत के तमाम शब्द ध्वनि विज्ञान पर आधारित हैं। हमारे पवित्रतम शब्द ‘ऊँ’ को ही लें…

युद्ध के हर बढ़ते दिन के साथ दुनिया का तापमान भी चढ़ रहा है। डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के इस अविवेकी निर्णय ने विश्व की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। कच्चे तेल की कीमतें शनिवार की दोपहर तक 102 डॉलर प्रति बैरल के करीब जा पहुंची थीं…

सियासत और समय का अनोखा रिश्ता है। इस बार एक सियासी शख्सियत पर समय भारी पड़ रहा था। ऐसे में, नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का निर्णय उनकी सियासी परिपक्वता का परिचायक है। उन्होंने शीर्ष पर रहते हुए पटरी बदलने का फैसला खुद किया है…

न्यायपालिका इस देश के करोड़ों निर्बलों की अंतिम आस है। इसके मान-सम्मान की सुरक्षा उन लोगों की उम्मीदों की रक्षा होगी। अगर भारतीय सत्ता और समाज पर इनके संरक्षण की जिम्मेदारी है, तो इस संदर्भ में अपने हिस्से का भार अदालतों और उनके कर्ताधर्ताओं को भी उठाना होगा…

जो लोग इस महासम्मेलन को बेजा बता रहे हैं, वे जान लें। पिछले दिनों अमेरिका के प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय ने एक शोध में भारत को एआई के मामले में तीसरी सबसे बड़ी शक्ति के तौर पर आंका है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि…

हम भारत के लोग अपने लुटे वैभव को पाने के लिए आजादी के पहले पल से प्रयास कर रहे हैं। गुजरे 76 साल में अगर कुछ ऐसा है, जिस पर शर्म की जाए, तो बहुत कुछ ऐसा भी है, जिस पर गर्व किया जा सके। हमें अपने भरोसे और सपनों को ठीक से संजोना क्यों नहीं आता…

तेहरान की सरकार ने जल-संकट से निपटने के लिए ‘स्मार्ट मीटरिंग’ के साथ पानी के दबाव में कटौती की है, परंतु यह समस्या को वक्ती तौर पर टालने से अधिक कुछ भी नहीं। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो अमेरिकी प्रक्षेपास्त्रों से ज्यादा पानी की कमी यहां के लोगों के लिए घातक साबित होगी…

बजट पूर्व आर्थिक सर्वेक्षणों का इतिहास गवाह है कि उनके कुछ सुझाव माने जाते हैं और कुछ ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। यह पहला मौका है, जब निर्मला सीतारमण पर अंदरूनी की जगह बाहरी चुनौतियों का दबाव बहुत अधिक है, लेकिन वह कंटीली चुनौतियों से बंटी हुई रस्सी पर…

आप सोच रहे होंगे, भाषा, आरक्षण, समान नागरिक संहिता आदि तो आज तक विवाद का विषय बने हुए हैं। अगर किसी देश के लोग लोकतांत्रिक भाव से ऐसे विवादों में बरसों-बरस उलझे रहने के बावजूद साथ चलने के हिमायती हों, तो इसमें हर्ज क्या? संविधान सभा के गठन से आज तक भारतवासियों ने…

सोशल मीडिया के वक्त में, जब मुंह से निकला महज एक बहका शब्द देश-दुनिया के किसी भी हिस्से में अंगारे बो सकने की कुव्वत रखता हो, तब क्या हमारे नेताओं को देशहित में सोच-समझकर नहीं बोलना चाहिए? वे भूल क्यों जाते हैं?…

डोनाल्ड ट्रंप को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की भी कोई ‘परवाह’ नहीं। साल भर पहले तक यह सब कुछ अकल्पनीय था। हम अकल्पनीयता को असलियत बनते देखने को अभिशप्त हैं। ऐसे में, कोई यह दावा नहीं कर सकता कि ट्रंप का अगला कदम क्या होगा…

वर्ष 2025 ने अगर बहुत कुछ दिया है, तो साल 2026 के समक्ष युद्धों की नई चुनौती खड़ी कर दी है। क्या हर रोज जंग की ज्वाला की ओर घिसट रही हमारी दुनिया में अब भी शांति और सहमति के नए सूत्र तलाशने की कुव्वत शेष है? इस सवाल का जवाब ही…

गुजरे कल और आज के बदलते हालात की तुलना करें, तो क्या चेतावनी की कुछ नई अनुगूंजें आपको नहीं सुनाई पड़ उठतीं? इस गुजरते सन् 2025 में भले ही हमने 21वीं सदी की रजत जयंती मनाई, पर स्वर्ण जयंती को चमकदार बनाने के लिए जरूरी है कि बिगड़ते पर्यावरण को…