हिंदू धर्म: संन्यास लेने से पहले खुद का अंतिम संस्कार क्यों किया जाता है?

Dec 22, 2025 01:49 pm ISTNavaneet Rathaur लाइव हिन्दुस्तान
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संन्यास लेने से पहले आत्म-श्राद्ध या स्वयं का अंतिम संस्कार करने की परंपरा है। यह एक प्रतीकात्मक अनुष्ठान है, जिसमें साधक अपने पुराने जीवन का 'मृत्यु' संस्कार करता है।

हिंदू धर्म: संन्यास लेने से पहले खुद का अंतिम संस्कार क्यों किया जाता है?

हिंदू धर्म में संन्यास जीवन का चौथा आश्रम है, जहां व्यक्ति गृहस्थ जीवन त्यागकर पूरी तरह भगवान की भक्ति और मोक्ष की साधना में लग जाता है। संन्यास लेने से पहले आत्म-श्राद्ध या स्वयं का अंतिम संस्कार करने की परंपरा है। यह एक प्रतीकात्मक अनुष्ठान है, जिसमें साधक अपने पुराने जीवन का 'मृत्यु' संस्कार करता है। शास्त्रों में इसे विरजा होम या प्रैष श्राद्ध कहा जाता है। इसका उद्देश्य पुराने संसारिक बंधनों से मुक्ति और नई आध्यात्मिक जिंदगी की शुरुआत है। यह परंपरा उपनिषदों और स्मृतियों में वर्णित है। आइए जानते हैं इसके महत्व को।

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संसारिक बंधनों से मुक्ति का प्रतीक

संन्यास लेने वाला व्यक्ति गृहस्थ जीवन के सभी बंधनों - परिवार, संपत्ति, नाम-यश को त्याग देता है। आत्म-श्राद्ध में वह प्रतीकात्मक रूप से अपने पुराने जीवन का अंतिम संस्कार करता है। इसमें पिंडदान, तर्पण और अग्नि में आहुति दी जाती है। यह घोषणा करता है कि अब वह 'मृत' है संसार के लिए और जीवित है केवल भगवान के लिए। शास्त्रों में कहा गया है कि संन्यासी को 'द्विज' (दो बार जन्मा) माना जाता है - पहला जन्म मां के गर्भ से और दूसरा संन्यास से। यह अनुष्ठान पुराने जन्म को समाप्त कर नया जन्म देता है।

पितृ ऋण और कर्म बंधन से मुक्ति

हिंदू धर्म में तीन ऋण माने जाते हैं - देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण। गृहस्थ जीवन में ये ऋण चुकाए जाते हैं। संन्यास लेने से पहले आत्म-श्राद्ध करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। साधक अपने लिए ही पिंडदान करता है, जिससे पितरों को तृप्ति मिलती है और वे उसे आशीर्वाद देते हैं। यह अनुष्ठान पूर्वजन्म के कर्म बंधनों को भी काटता है। संन्यासी अब किसी का उत्तराधिकारी नहीं रहता, इसलिए यह संस्कार उसे सभी दायित्वों से मुक्त करता है।

अहंकार और आसक्ति का त्याग

आत्म-श्राद्ध में साधक प्रतीकात्मक रूप से अपना शरीर अग्नि को समर्पित करता है। यह अहंकार का अंतिम संस्कार है। यह अनुष्ठान सिखाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। इससे आसक्ति, मोह और कामनाएं त्यागने में मदद मिलती है। संन्यासी अब केवल भगवान की साधना में लग जाता है। यह अनुष्ठान मन को शुद्ध करता है और मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है।

संन्यास के बाद का जीवन और महत्व

यह संस्कार करने के बाद संन्यासी नया नाम धारण करता है और भिक्षाटन शुरू करता है। वह अब समाज से अलग होकर केवल भगवान की भक्ति करता है। शास्त्रों में कहा गया है कि संन्यास बिना इस अनुष्ठान के अधूरा रहता है। आजकल कई साधु-संत यह परंपरा निभाते हैं। यह अनुष्ठान सिखाता है कि सच्चा संन्यासी संसार को 'मृत' मानकर जीता है।

संन्यास से पहले आत्म-श्राद्ध करना पुराने जीवन का अंत और नए आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत है। यह परंपरा हिंदू धर्म की गहराई को दर्शाती है।

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

Navaneet Rathaur

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नवनीत राठौर नए युग के डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में करीब 7 साल का अनुभव है। वर्तमान में वो भारत की प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान लाइव हिंदुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन के हिस्सा हैं। यहां वह अंक ज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान, वास्तु शास्त्र, वैदिक ज्योतिष से जुड़ी खबरें लिखते हैं।


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नवनीत ने शारदा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा से जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक और शुभारती विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई की। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान संस्थानों से विषयों को तत्थात्मक और प्रभावी तरीके से समझने का सलीका सीखा। यहीं से उन्हें पत्रकारिता की सीढ़ी मिली।


नवनीत राठौर ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत जनतंत्र न्यूज चैनल से की। इसके बाद उन्होंने सूर्या समाचार और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। इसके बाद नवनीत लाइव हिंदुस्तान की एस्ट्रोलॉजी टीम का हिस्सा बने। पाठकों को सरल, विश्वसनीय और प्रेरणादायक जानकारी प्रदान करना ही नवनीत राठौर का मुख्य उद्देश्य है।


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