बिहार राजगीर मेला: कागभुशुण्डि से जुड़ा है कौओं का रहस्य, मलमास में होते हैं शाही स्नान, 33 करोड़ देवता करते हैं निवास

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बिहार में इस समय राजगीर मेला चल रहा है। यह मेला एक महीने यानी 15 जून तक चलेगा। लाखों लोगइस मेले में स्नान करने आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि राजगीर के पवित्र गर्म पानी के 22 कुंड, 52 धाराओं में तीन शाही स्नान का महायोग है। 

बिहार राजगीर मेला: कागभुशुण्डि से जुड़ा है कौओं का रहस्य, मलमास में होते हैं शाही स्नान, 33 करोड़ देवता करते हैं निवास

बिहार में इस समय राजगीर मेला चल रहा है। यह मेला एक महीने यानी 15 जून तक चलेगा। लाखों लोगइस मेले में स्नान करने आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि राजगीर के पवित्र गर्म पानी के 22 कुंड, 52 धाराओं में तीन शाही स्नान का महायोग है। मान्यताओं के अनुसार, इन कुंड में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप और कष्ट धुल जाते हैं।

एक महीने में किस-किस तिथि में होंगें शाही स्नान

यहां 21, 27, 31 मई में, 5 जून, 11 जून और 15 जून को शाही स्नान होगा। पहला शाही स्नान 21 मई को ज्येष्ठ पंचमी को शुरू होगा, इसके बाद 27 मई को एकादशी और फिर 31 मई को पूर्णिमा पर शाही स्नान होगा। देशभर से लोग इन प्रमुख शाही स्नान के दिनों में लगभग 2 से 2.5 लाख श्रद्धालु एक साथ कुंडों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस पवित्र महीने की अवधि में हिंदू धर्म के सभी 33 कोटि देवी-देवता राजगीर में निवास करते हैं।

इसे मलमास मेला क्यों कहते हैं?

इस एक महीने के दौरान देश के अन्य सभी हिस्सों में मुंडन, विवाह, गृह प्रवेश जैसे सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्य पूरी तरह वर्जित होते हैं, लेकिन राजगीर की धरती पर पूजा-पाठ, दान-पुण्य और स्नान करने से अनंत गुना फल की प्राप्ति होती है। 3 वर्ष में एक बार जिस तरह मलमास आता है, उसी तरह राजगीर में मेला लगता है। इस पूरे माह में देवी-देवताओं का निवास राजगीर की तपोभूमि में होता है, इसलिए इस अवधि में यहां स्नान, दान, जप और तप का विशेष महत्व माना गया है।

कागभुशुण्डि से जुड़ी है कथा, इसलिए नहीं आते कौएं

राजगीर के मलमास मेले की सबसे अनोखी और रहस्यमयी मान्यता कौओं को लेकर प्रचलित है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मलमास अवधि में राजगीर क्षेत्र में कौए दिखाई नहीं देते। यह मान्यता कागभुशुण्डि से जुड़ी है। कागभुशुण्डि भगवान राम के भक्त थे, उन्हें जब कौए का जन्म मिला तो वो राजगीर आकर बस गए । ऐसा कहा जाता है कि जब माता पार्वती को शिवजी रामजी की कथा सुना रहे थे, तो कागभुशुण्डि ने वो कथा सुन ली थी। उन्होंने कौए का स्वरूप धारण कर अमर ज्ञान प्राप्त किया था। एक बार वहां के राजा ने कागभुशुण्डि के वाजपेयी यज्ञ में नहीं बुलाया तभी से समस्य कौए इस महीने में यहां से चले जाते हैं। मान्यता है कि देवताओं के राजगीर आगमन के समय इस पवित्र भूमि की आध्यात्मिक मर्यादा के कारण कौओं का यहां प्रवेश नहीं होता।

क्यों कहा जाता है मलमास

मलमास मास को लेकर हिंदू धर्म में कहा जाता है कि काल गणना के अनुसार 13वें महीना आया तो इसमें कोई पूर्णिमा और अमावस्या नहीं थी, इसलिए इसे मलिन कहा जाने लगा। इसकी मलिनता के कारण इसे मलमास कहा जाने लगा और कोई भी देवता इसका उत्तराधिकारी या स्वामी बनने को तैयार नहीं हुआ। इस संकट की घड़ी में भगवान विष्णु ने आगे बढ़कर इसे सहर्ष स्वीकार किया और इसे अपना सबसे प्रिय नाम 'पुरुषोत्तम मास' दिया। भगवान विष्णु के साथ-साथ स्वर्ग के सभी 33 कोटि देवता एक महीने के लिए राजगीर आकर रहने लगे। यही कारण है कि राजगीर की धरती पर पूजा-पाठ, दान-पुण्य और स्नान करने से अनंत गुना फल की प्राप्ति होती है।

Anuradha Pandey

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शार्ट बायो

अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।


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