क्या है यज्ञोपवीत या जनेऊ के तीन सूत्रों और नौ धागों का मतलब?
क्या है यज्ञोपवीत, जनेऊ के तीन सूत्रों और नौ धागों को क्या अर्थ निकाला जाता है। इनका क्या अर्थ कहा जाता है। आइए जानें इनके बारे में

यज्ञोपवीत के तीन लड़, सृष्टि के समस्त पहलुओं में व्याप्त त्रिविध धर्मों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। तैत्तिरीय संहिता 6, 3, 10, 5 के अनुसार तीन लड़ों से तीन ऋणों का बोध होता है। ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण। आइए जानते हैं यज्ञोपवीत के नौ धागे और तीन लड़ किन बातों का प्रतीक हैं। यज्ञोपवीत के तीन सूत्रों में कौन से देवता वास करते हैं।यज्ञोपवीत के नौ धागे किस चीज का प्रतीक माने जाते हैं। इन चीजों से जुड़ी जानकारी आपको इस लेश में मिलेगी।
यज्ञोपवीत के तीन सूत्रों में कितने देवता करते हैं वास
सामवेदीय छांदोग्यसूत्र में लिखा है- ब्रह्मा ने तीन वेदों से तीन लड़ों का सूत्र बताया। विष्णु ने ज्ञान, कर्म, उपासना इन तीनों कांडों से तिगुना किया। शिव ने गायत्री से अभिमंत्रित कर उसमें ब्रह्म गांठ लगा दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार और ग्रंथियां समेत बनकर तैयार हुआ। यज्ञोपवीत के तीन सूत्रों में नौ देवता वास करते हैं-ओंकार- ब्रह्म, अग्नि- तेज, अनंत- धैर्य, चंद्र-शीतल प्रकाश, पितृगण- स्नेह, प्रजापति- प्रजापालन, वायु-स्वच्छता, सूर्य- प्रताप, सब देवता- समदर्शन।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते हैं प्रसन्न
ब्रह्मा, विष्णु और महेश यज्ञोपवीतधारी द्विज की उपासना से प्रसन्न होते हैं। त्रिगुणात्मक तीन लड़ बल, वीर्य और ओज को बढ़ाने वाले हैं, वेदत्रयी, ऋक, यजु, साम की रक्षा करती हैं। सत, रज व तम तीन गुणों की सगुणात्मक वृद्धि करते हैं। यह तीनों लोकों के यश की प्रतीक हैं। माता, पिता और आचार्य के प्रति समर्पण, कर्तव्यपालन, कर्तव्यनिष्ठा की बोधक हैं।
यज्ञोपवीत के नौ धागे नौ सद्गुणों के प्रतीक
यज्ञोपवीत के नौ धागे नौ सद्गुणों के प्रतीक माने जाते हैं। ये हृदय में प्रेम, वाणी में माधुर्य, व्यवहार में सरलता, नारी मात्र के प्रति पवित्र भावना, कर्म में कला और सौंदर्य की अभिव्यक्ति, सबके प्रति उदारता, सेवा भावना, शिष्टाचार और अनुशासन, स्वाध्याय एवं सत्संग, स्वच्छता, व्यवस्था और निरालस्यता माने गए हैं। इन्हें अपनाने का निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। इससे व्यक्ति सही रास्ते पर चलता है।
इन्हें अपने व्यवहार में लाने की कोशिश करनी चाहिएष वेद और गायत्री के अभिमत को स्वीकार करना और यज्ञोपवीत पहनकर ही गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए। 96 चौवे (चप्पे) लगाने का अभिप्राय है- गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं और वेद 4 हैं। इस प्रकार चारों वेदों के गायत्री मंत्रों के कुल गुणनफल 96 अक्षर आते हैं। सामवेदी छांदोग्य सूत्र के मतानुसार तिथि-15, वार-7, नक्षत्र-27, तत्त्व-25, वेद-4, गुण-3, काल-3, मास-12 इन सबका जोड़ 96 होता है।
(साभार : ‘हिंदुओं के रीति-रिवाज तथा मान्यताएं,’ पुस्तक महल, दिल्ली)


