वैशाख मास में एक चौथाई दिन श्रीहरि जल में निवास करते हैं, स्नान का महत्व अश्वमेध यज्ञ के समान
वैशाख के समान कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है।अपनी इसी विशिष्टता के कारण वैशाख मास, जिसे सामान्यत: बैसाख भी कहते हैं

न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम्।
न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।
(-स्कंद पुराण, वैष्णव खंड)
-‘वैशाख के समान कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है।’अपनी इसी विशिष्टता के कारण वैशाख मास, जिसे सामान्यत: बैसाख भी कहते हैं, को सभी मासों में उत्तम मास कहा गया है। भगवान विष्णु ने वैशाख मास में मधु दैत्य का वध किया था, इसलिए इस महीने को ‘माधव’ मास भी कहा जाता है।
वैशाख मास में सभी तीर्थ, देवी-देवता आदि जल में निवास करते हैं
पुराणों में ऐसा वर्णन है कि देवर्षि नारद ने राजा अंबरीश से कहा था कि स्वयं ब्रह्मा ने वैशाख मास को सब मासों में उत्तम कहा है। वैशाख मास में सभी तीर्थ, देवी-देवता आदि जल में निवास करते हैं। भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छह दंड (दिन का एक चौथाई भाग) तक वहां उपस्थित रहते हैं। जो पुण्य सभी प्रकार के दान और जो फल सभी तीर्थों के दर्शन से मिलता है, उसी पुण्य और फल की प्राप्ति वैशाख मास में केवल जल का दान करने से हो जाती है। देवर्षि नारद ने राजा अंबरीश से कहा था कि वैशाख मास में खड़ाऊं दान करने से मनुष्य को विष्णु लोक में स्थान मिलता है।
प्रात: स्नान का महत्व अश्वमेध यज्ञ के समान
वैशाख मास में भगवान विष्णु के माधव रूप की पूजा की जाती है। इस मास में जो मनुष्य सात गंगाओं- जाह्नवी (गंगा), वृद्ध गंगा (गोदावरी), कालिंदी (यमुना), सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और वेणी नदी में से किसी एक में भी सूर्योदय पूर्व स्नान करता है, उसे मोक्ष मिलता है।पद्म पुराण के अनुसार वैशाख मास में प्रात: स्नान का महत्व अश्वमेध यज्ञ के समान माना गया है। ऐसी मान्यता है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी से वैशाख पूर्णिमा तक इन पांच दिनों में सूर्योदय पूर्व स्नान करने से न सिर्फ पूरे माह के स्नान करने का बल्कि वर्ष भर के पूजा-पाठ, दान और स्नान का फल मिल जाता है। राजा महीरथ को केवल वैशाख मास के स्नान से ही मोक्ष मिल गया था।
वैशाखी पूर्णिमा के दिन क्या दान करें
वैशाखी पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्मा ने तिलों को उत्पन्न किया था। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के स्वेद से सफेद तथा काले तिलों का जन्म हुआ था, इसलिए इस मास में सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों में काले तिलों का प्रयोग किया जाता है। लक्ष्मी की पूजा में सिर्फ सफेद तिल का और विष्णु पूजा में काले तिल का महत्व है। इसी प्रकार इस माह में तिल के दान और सेवन के साथ-साथ जल, छाता, पंखा, चटाई, जूते-चप्पल का दान करना विशेष पुण्य देने वाला होता है। जिस प्रकार माघ मास में प्रयाग में कल्पवास करना पुण्यदायी माना गया है। उसी प्रकार वैशाख मास में उज्जैन में कल्पवास करना विशेष पुण्य फलदायी माना गया है। चैत्र पूर्णिमा से वैशाखी पूर्णिमा पर्यंत कल्पवास, प्रतिदिन क्षिप्रा-स्नान का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति वैशाख मास में यहां वास करता है, वह साक्षात शिव स्वरूप हो जाता है।
अरुण कुमार जैमिनि
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