
सत्यकाम ने शिष्य उपकोशल को ऐसे दिया था ब्रह्मज्ञान, कही थी ये बात
ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद सत्यकाम विवाह करके जीवन व्यतीत करने लगा। आश्रम स्थापित करके वो दूसरों को शिक्षा दिया किया करता था। उसके आश्रम में दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन करने के लिए आते थे। सत्यकाम की विद्वत्ता की कहानी कमल के पुत्र उपकोशल के कानों में भी पड़ी। जानें इनकी अनकही एक कहानी…
ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के पश्चात सत्यकाम विवाह करके जीवन व्यतीत करने लगा। वह आश्रम स्थापित करके विद्यार्थियों को विद्या प्रदान किया करता था। उसके आश्रम में दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन करने के लिए आते थे। सत्यकाम की विद्वत्ता की कहानी कमल के पुत्र उपकोशल के कानों में भी पड़ी। वह भी विद्या प्राप्त करने के उद्देश्य से सत्यकाम के आश्रम में जा पहुंचा। सत्यकाम की अनुमति से उपकोशल ब्रह्मचारी के रूप में विद्याध्ययन करने लगा। कई वर्षों के पश्चात जब अध्ययन समाप्त हो गया, तो सत्यकाम ने दूसरे विद्यार्थियों का तो समावर्तन संस्कार करके उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी, पर उन्होंने उपकोशल का न तो समावर्तन किया, न उसे घर जाने की आज्ञा दी। उपकोशल मन-ही-मन दुखी हुआ। वह सोचने लगा, आचार्य ने उसके साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया?
गुरु-पत्नी उपकोशल को दुखी देखकर द्रवित हो उठीं। उन्होंने आचार्य से कहा, ‘उपकोशल ने आपके यज्ञ की अग्नि की बड़ी सेवा की है। अध्ययन में भी इसने कुछ उठा नहीं रखा है। फिर आपने उसका दीक्षा-संस्कार क्यों नहीं किया? उसे घर जाने की आज्ञा क्यों नहीं प्रदान की?’ आचार्य ने पत्नी की बातें सुनीं तो, पर उन पर ध्यान नहीं दिया। वे मौन ही रहे। उपकोशल ने विद्या तो पढ़ ली थी, पर ब्रह्मज्ञान का अधिकारी वह अभी नहीं बन सका था, क्योंकि उसके मन में कामनाएं शेष रह गई थीं। वे ब्रह्मज्ञान देकर उसके जीवन को धन्य बनाना चाहते थे।
कुछ दिनों पश्चात आचार्य यात्रा पर चले गए। आचार्य के चले जाने पर भी वह आश्रम में ही रहा। उपकोशल ने दुखी होकर अन्न-जल का परित्याग कर दिया। उसे ऐसा करते देख गुरु-पत्नी के मन में दया उत्पन्न हो गई। उन्होंने उपकोशल के पास जाकर उससे कहा, ‘वत्स, तुमने अन्न और जल का परत्यिाग क्यों कर दिया? इससे क्या लाभ होगा?’
उपकोशल ने उत्तर दिया, ‘माता, मैंने सोचा था, विद्या प्राप्त करने के पश्चात घर जाऊंगा, विवाह करूंगा और आश्रम बनाकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करूंगा, पर आचार्य ने मेरा दीक्षा-संस्कार ही नहीं किया। मेरी कामनाएं मिट्टी में मिल गईं।’ गुरु-पत्नी उत्तर देतीं, तो क्या देतीं? वे मौन रह गईं। उपकोशल के अनशन का क्रम नहीं टूटा।
उपकोशल ने यज्ञ की अग्नियों की सेवा बड़ी निष्ठा से की थी। उसके अनशन को देखकर अग्नि के मन में भी दया उत्पन्न हो गई। उसने प्रकट होकर कहा, ‘उपकोशल, तुमने हमारी बड़ी सेवा की है। हम तुम्हें ज्ञान का उपदेश कर रहे हैं।’ अग्नियों ने बारी-बारी से उपकोशल को ज्ञान का उपदेश दिया। अग्नियों के उपदेश से उपकोशल का मुखमंडल ही नहीं, हृदय भी आलोकित हो उठा।
कुछ दिनों पश्चात आचार्य जब यात्रा से लौटकर आए, तो वे उपकोशल के मुखमंडल को देखकर चकित हो गए। उन्होंने उससे पूछा, ‘वत्स, तुम्हारे मुखमंडल पर अपूर्व तेज है। प्रतीत होता है, तुम्हें किसी ने ज्ञान का उपदेश दिया है।’ उपकोशल ने अपने अनशन और अग्नियों के उपदेश की कहानी आचार्य को सुना दी ! आचार्य अतीव प्रसन्न हुए। वे विचारों में डूबकर सोचने लगे। कुछ क्षणों पश्चात आचार्य ने सोचते हुए कहा, ‘मैं यही चाहता था, उपकोशल कि अग्नि तुम्हें उपदेश दें। उनकी कृपा तुम्हें प्राप्त हो गई। अब मैं तुम्हें ब्रह्मज्ञान प्रदान करूंगा।’ आचार्य ने उपकोशल को ब्रह्मज्ञान देखकर उसका समावर्तन संस्कार किया और उसके बाद उसे घर जाने की अनुमति दे दी।
श्री व्यथितहृदय
(साभार : उपनिषदों की श्रेष्ठ कहानियां, सुनील साहित्य सदन, नई दिल्ली)





