प्रेम की राह में बाधक विचार

प्रेम की राह में बाधक विचार

संक्षेप:

निश्चित ही विचार की अपनी एक जगह है, लेकिन यह किसी भी तरह प्रेम से संबंधित नहीं है। जिसका विचार से संबंध है, उसे विचार द्वारा समझा जा सकता है, पर जो विचार से संबंधित नहीं है, वह मन की पकड़ में नहीं आता है।

Dec 09, 2025 01:14 pm ISTShrishti Chaubey लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, जे. कृष्णमूर्ति
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विचार की प्रक्रिया प्रेम को सदैव नकारती है। विचार में ही भावनात्मक जटिलताएं हुआ करती हैं, प्रेम में नहीं। विचार ही प्रेम में सबसे बड़ा बाधक है। हमको विचार द्वारा प्रेम को समझने की बजाय खुद विचार को ही समझना होगा।

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भावनाओं और सनसनी से छलकता हुआ विचार प्रेम नहीं है। विचार अपरिहार्य रूप से प्रेम का निषेध करता है। विचार स्मृति पर आधारित है, और प्रेम स्मृति नहीं है। जिससे आपका प्रेम है, जब आप उसके बारे में सोचते हैं, तो वह प्रेम नहीं है। आप किसी मित्र की आदतों का, तौर-तरीकों का, स्वभाव विशेष का स्मरण कर सकते हैं, उस मित्र के साथ अपने संबंध के दौरान हुई सुखद या दुखद घटनाओं के बारे में सोच सकते हैं, किंतु विचार जिन चित्रों को उभारता है, वे प्रेम नहीं हैं। विचार की प्रकृति ही ऐसी है कि यह अलगाव लाता है। समय और अंतराल, अलगाव और दुख का आभास विचार की प्रक्रिया से ही जन्म लेता है और केवल तभी, जब विचार प्रक्रिया थम जाती है, प्रेम संभव है।

विचार से स्वामित्व का भाव उत्पन्न होता है। मालिक होने का यह अहसास ही चेतन अथवा अचेतन तल पर ईर्ष्या को पनपाता है। जहां ईर्ष्या होती है, जाहिर है कि वहां प्रेम नहीं होता; फिर भी अधिकतर लोग ईर्ष्या को प्रेम का एक लक्षण मानते हैं। ईर्ष्या विचार का परिणाम है, यह विचार की भावनात्मक अंतर्वस्तु की प्रतिक्रिया है। जब मालिक बनने या बना लेने की भावना में बाधा आती है, तो इतना सूनापन घेर लेता है कि ईर्ष्या प्रेम का स्थान ले लेती है। चूंकि विचार प्रेम की भूमिका में आ जाता है, हर तरह की उलझनें और दुख जन्म लेते हैं।

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विचार की प्रक्रिया प्रेम को सदैव नकारती है। विचार में ही भावनात्मक जटिलताएं हुआ करती हैं, प्रेम में नहीं। विचार ही प्रेम में सबसे बड़ा बाधक है। विचार ‘जो है’ तथा ‘जो होना चाहिए’ के बीच विभाजन रचता है और नैतिकता इसी विभाजन पर आधारित होती है, पर न तो नैतिक और न ही अनैतिक प्रेम को जान पाते हैं। सामाजिक संबंधों को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए मन ने जिस नैतिक संरचना को खड़ा किया है, वह प्रेम नहीं है, वह तो सीमेंट की तरह कड़ा-कठोर करने वाली प्रक्रिया है। विचार प्रेम की ओर नहीं ले जाता। विचार प्रेम को पोषित-विकसित नहीं करता।

यदि आप थोड़े भी सजग हैं, तो देख पाएंगे कि विचार की आपके जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। निश्चित ही विचार की अपनी एक जगह है, लेकिन यह किसी भी तरह प्रेम से संबंधित नहीं है। जिसका विचार से संबंध है, उसे विचार द्वारा समझा जा सकता है, पर जो विचार से संबंधित नहीं है, वह मन की पकड़ में नहीं आता है। आप पूछेंगे, तब प्रेम है क्या? प्रेम अस्तित्व की, ‘होने’ की एक अवस्था है, जिसमें विचार नहीं है; किंतु प्रेम की परिभाषा तो विचार की प्रक्रिया ही है और इसलिए यह प्रेम नहीं है।

हमको विचार द्वारा प्रेम को समझने की बजाय खुद विचार को ही समझना होगा। विचार का नकार प्रेम को जन्म नहीं देता। विचार से मुक्ति तभी होती है, जब इसकी गहन सार्थकता को पूरी तरह से समझ लिया जाता है; इसके लिए गहरे स्वबोध की, स्वयं को जानने की आवश्यकता होती है, न कि व्यर्थ तथा उथले दावों की।

Shrishti Chaubey

लेखक के बारे में

Shrishti Chaubey
लाइव हिन्दुस्तान में बतौर कॉन्टेंट प्रोड्यूसर काम कर रही सृष्टि चौबे को पत्रकारिता में 2 साल से ज्यादा का अनुभव है। सृष्टि को एस्ट्रोलॉजी से जुड़े विषयों पर लिखने की अच्छी समझ है। इसके अलावा वे एंटरटेनमेंट और हेल्थ बीट पर भी काम कर चुकी हैं। सृष्टि ग्रह गोचर, नक्षत्र परिवर्तन, हस्तरेखा, फेंगशुई और वास्तु पर अच्छी जानकारी रखती हैं। खबर लिखने के साथ-साथ इन्हें वीडियो कॉन्टेंट और रिपोर्टिंग में भी काफी रुचि है। सृष्टि ने जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। अपने कॉलेज के दिनों में इन्होंने डाटा स्टोरी भी लिखी है। साथ ही फैक्ट चेकिंग की अच्छी समझ रखती हैं। और पढ़ें
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