संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है?
दुख सत्य है और सुख असत्य है, ऐसा नहीं है। संसार का अर्थ ही यह है कि जहां सुख दिखाई देता है, वहां हर पल सुख का आभास होता है, लेकिन जैसे-जैसे पास जाओगे, पता चलता है कि सुख है ही नहीं। फिर सुख कहां है?

संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है: एक दिन कुछ बौद्ध भिक्षुओं में चर्चा हो रही थी। चर्चा का विषय था- ‘संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है?’ अगर संसार में सुख ही सुख है, तो फिर हम सब या दूसरे लोग उसे छोड़कर भिक्षु क्यों बन जाते हैं? सुख तो इसका कारण नहीं है। दुख होने पर ही व्यक्ति भिक्षु होता है, जबकि वास्तविकता यह है कि व्यक्ति यदि यह समझ ले कि सुख-दुख कुछ नहीं है, तो फिर सारी परेशानी ही खत्म हो जाएगी। व्यक्ति यदि समभाव से परिस्थितियों का सामना करना सीख जाए, तो फिर उसे गृहस्थ से भिक्षु होने की आवश्यकता ही नहीं होगी।
व्यक्ति भिक्षु ही तब होता है, जब उसे लगता है कि यह संसार ही व्यर्थ है। रिश्ते-नाते सब मोह-माया है। यहां आने वाले भिक्षु भी ऐसे ही घर से भागकर यहां आए होंगे। किसी की पत्नी मर गई होगी, तो कोई जीवन में कुछ न कर पाने की पीड़ा से भागकर भिक्षु हो गया होगा। कोई भिक्षु सांसारिक वस्तुओं के भोग को सुख बता रहा था। उसका मानना था कि सुख भोगने वाला व्यक्ति भिक्षु नहीं बनता। इन भिक्षुओं में काफी देर से आपस में ऐसी ही चर्चा चल रही थी।
तभी भगवान बुद्ध वहां आ गए और भिक्षुओं के पीछे खड़े होकर मौन भाव से उनकी बातें सुनने लगे। उन्होंने भिक्षुओं से कहा, ‘भिक्षु होकर भी तुम किस तरह की बातें कर रहे हो? कोई राज्य को सुख बता रहा है, तो कोई स्वादिष्ट भोजन में सुख ढूंढ़ रहा है, तो कोई स्वाद में। अगर इन सब वस्तुओं में सुख है, तो फिर तुम सब यहां भिक्षु बनने क्यों चले आए? मुझे तुम्हारी ये बातें सुनकर आश्चर्य हुआ। ये सुख तो आभास मात्र हैं।’
बुद्ध ने आगे कहा, ‘दुख सत्य है और सुख असत्य है, ऐसा नहीं है। संसार का अर्थ ही यह है कि जहां सुख दिखाई देता है, वहां हर पल सुख का आभास होता है, लेकिन जैसे-जैसे पास जाओगे, पता चलता है कि सुख है ही नहीं।’ ‘फिर सुख कहां है?’ बुद्ध ने कहा, ‘बुद्धत्व में सुख है। तुम्हारे भीतर बुद्ध का जन्म हो जाए, तो सुख है। तुम्हारे भीतर बुद्ध का अवतरण हो जाए, तो सुख है।’ बुद्धत्व बहुत अनूठा शब्द है।
तुम्हारे भीतर बुद्ध उत्पन्न हो जाए, तो सुख है। तुम जब जागो, तो सुख है। सोने में दुख है। मूर्च्छा में दुख है। जागने में सुख है। धर्म का श्रवण करना सुख है। सबसे परम सुख है कि तुम्हारे भीतर बुद्धत्व पैदा हो जाए।
‘तो सुनो उनकी, जो जाग गए हैं। जिन्हें कुछ दिखाई पड़ा है, लेकिन उसी सुख पर रुक मत जाना। सुन-सुनकर अगर रुक गए, तो एक तरह का सुख तो मिलेगा, लेकिन यह भी बहुत दूर जानेवाला नहीं है।’ इसलिए बुद्ध ने कहा, ‘समाधि में सुख है। बुद्धत्व में सुख है, यह तो परम व्याख्या हुई सुख की। फिर यह भी नहीं हुआ, तो उनके वचन सुनो, उनके पास उठो-बैठो, जिनके भीतर यह क्रांति घटी है। जिनके भीतर यह सूरज निकला है। जिनका प्रभात हो गया है। जहां सूर्योदय हुआ है, उनके पास रमो, इसमें सुख है। मगर इसमें ही रुक मत जाना। ध्यान रखना कि जो उनको हुआ है, वह तुम्हें भी करना है। उस करने के उपाय का नाम समाधि है।
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