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sawan 2019: श्रावणी मेला में होते हैं लघु भारत दर्शन, कई रूपों में दिखते हैं कांवड़िया

shravani mela deoghar

विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला में लघु भारत के दर्शन होते हैं। बाबा वैद्यनाथ पर जलार्पण के लिए आने वाले विभिन्न राज्यों के कावंरियों से कई परंपराओं का संगम होता है। श्रद्धालुओं के विविध रंग-रूप के साथ कांवर की साज-सज्जा से अनूठी छटा बनती है। साथ ही मेला में दूसरे राज्यों की वस्तुओं को भी खरीदने का अवसर श्रद्धालुओं को मिलता है।

श्रावणी मेला के दौरान विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आसाम, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब, छतीसगढ़, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और महाराष्ट्र सहित दक्षिण के राज्यों से कांवरिये बाबा को जल चढ़ाने आते हैं। श्रावणी मेला में भारत के अलग-अलग प्रांतों की भाषा संस्कृति की झलक तो दिखती ही है,पड़ोसी देश नेपाल और भूटान के भी कांवरियों का जत्था मिल जाता है। इस दौरान कांवरियों की अलग-अलग परंपरा नजर आती है। कुछ कांवरिए रास्ते में खाते-पीते हुए आते हैं तो अधिकतर फलाहार पर रहते हैं। ऐसे कांवरियों की भी संख्या भी बहुत होती है जो पूजा करने से पूर्व कुछ भी नहीं खाते। वैसे कांवर यात्रा के दौरान सभी भेद मिट जाते हैं, ऐसे में कांवरियों में राज्य का फर्क करना बहुत मुश्किल हो जाता है। केसरिया वस्त्र और बोल बम के जयकारे में सभी समवेत होते हैं।

दूसरे राज्यों की मनपसंद चीजें खरीद ले जाते हैं श्रद्धालु: 
बाजार में कई ऐसी विशेष वस्तुएं उपलब्ध रहती हैं, जो श्रावण मास के बाद यहां नहीं मिलतीं। वैसे तो बाबाधाम का प्रसाद पेड़ा, चूड़ा, इलायचीदाना, सिंदूर और माला यहां पर मिलने वाली विशेष वस्तुएं होती हैं, लेकिन इन सब के अलावा भी कई ऐसी चीजें बाजार में उपलब्ध रहती हैं, जो दूसरे राज्यों से आती हैं। इनमें यूपी का घरेलू सजावट का सामान, सहारनपुर का लकड़ी का हैंडी-क्रफ्ट, बांस से बनी एक से एक बेहतरीत वस्तुएं, मुरादाबाद के कांसा, तांबा व पीतल के बर्तन, पूजा की थाली, फिरोजाबाद की चूड़ियां और कंगन, सीकरी की पत्थर से बनी शिवलिंग व मूर्तियां, पुरदिलनगर के मूंगा-मोती की मालाएं, बनारस और कोलकाता की रुद्राक्ष माला, साउथ की कलाकृतियां आदि मिलते हैं।


कांवरियों के अलग-अलग रूप-रंग
श्रावणी मेला के दौरान देवघर में आस्था के कई रूप-रंग देखने को मिलते हैं। वैसे तो कांवरिया पथ से लेकर बाबाधाम तक सबकुछ केसरिया नजर आता है मगर इसमें भी कांवरियों के अलग-अलग रूप-रंग दखने को मिल रहे हैं। कुछ कांवरिया भगवान शिव की तरह अपने-आप को सजाकर पहुंचते हैं तो कुछ पूरे शरीर पर भस्म लगाकर कांवर यात्रा करते हैं। बड़ी सख्या में कांवरियों का जत्था ढोल-नगाड़ों व डफली के साथ नाचते गाते देवघर पहुंचता है। कांवर के दोनों छोर पर गले में लिपटे नादद के साथ शिवजी का फोटो लगाया जाता है। कांवर को मखमली कपड़े व चुनरी से सजाया जाता है। भगवान शिव व माता पार्वती की प्लास्टिक की मूर्ती व शिवलिंग रखी जाती है। कुछ भक्त पूरे कांवर में घुंघरू लगवाते हैं। बहुत से भक्त लंबी-लंबी कांवर लेकर आते हैं। कोई कांवर 14 फीट की होती है तो कोई 20 फीट की। इस बार तो 54 फीट की कांवर भी पहुंची। कुछ भक्त श्रवण कुमार बन बहंगी में अपने वृद्ध माता-पिता को तीर्थ कराने लाते हैं तो कुछ भक्त अपने बच्चे को बहंगी में लेकर बाबाधाम पहुंच रहे हैं। 

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