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दत्तात्रेय भगवान का जयघोष है ‘अलख निरंजन'

दत्तात्रेय भगवान का एक प्रचलित जयघोष है ‘अलख निरंजन’। अलख निरंजन का भावार्थ क्या है! अंजन से तात्पर्य अज्ञान से लिया जाता है। अज्ञान का नष्ट होना यानी निरंजन होना इसलिए निरंजन का अर्थ है अज्ञान की कालिमा से मुक्त होकर ज्ञान में प्रवेश करना। लक्ष का तात्पर्य देख पाने की शक्ति से है। अलक्ष यानी ऐसा जिसे हम सामान्य नेत्रों से देख ही न पाएं। सामान्य बुद्धि जिसे समझ ही न पाए। वह इतना चमकीला इतना तेजस्वी है कि उसे देख पाना सहज संभव नहीं।

‘अलक्ष’ शब्द का अपभ्रंश है ‘अलख’। तो ‘अलख निरंजन’ का भाव हुआ, ज्ञान का ऐसा प्रकाशमान तेज, जिसे देख पाना संभव न होते हुए भी उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है।

इसका एक अर्थ और भी बताया जाता है-

-अघोरपंथियों के अनुसार अलख का अर्थ होता है जगाना (या पुकारना) और निरंजन का अर्थ होता है अनंत काल का स्वामी…

-अलख निरंजन का घोष करके वे कहते हैं- हे! अनंतकाल के स्वामी जागो, देखो हम पुकार रहे हैं।

-अलख का अर्थ है अगोचर, जो देखा न जा सके।

-निरंजन परमात्मा को कहते हैं। 'अलख निरंजन' का अर्थ यह भी हुआ- परमात्मा जिन्हें देखा न जा सके पर सब जगह व्याप्त हैं।

-अलख-निरंजन गुरु गोरखनाथ द्वारा प्रचारित ईश्वर को स्मरण करने के शब्द हैं।

(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)
 

 

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  • Web Title:What is niran jan