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Vat Savitri Kab Hai : कब रखा जाएगा वट सावित्री व्रत? नोट कर लें सही डेट, पूजा-विधि और महत्व

Vat Savitri Vrat 2024 Date : अखंड सौभाग्य का पर्व माने जाने वाला वट सावित्री व्रत इस बार 6 जून को मनाया जाएगा। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को निर्जला व्रत रखने की परंपरा है।

Vat Savitri Kab Hai : कब रखा जाएगा वट सावित्री व्रत? नोट कर लें सही डेट, पूजा-विधि और महत्व
Yogesh Joshiलाइव हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीThu, 06 Jun 2024 09:46 AM
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Vat Savitri Vrat : अखंड सौभाग्य का पर्व माने जाने वाला वट सावित्री व्रत इस बार 6 जून को मनाया जाएगा। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को निर्जला व्रत रखने की परंपरा है। मान्यता है कि जो सुहागिन महिलाएं इस व्रत को विधि-विधान से करतीं हैं, उन्हें अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होता है। महिलाएं वट सावित्री पूजा के दिन व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा करेंगी। इस व्रत को लेकर सुहागिन महिलाओं में उत्साह नजर आ रहा है। पूजा से संबंधित सामान की खरीदारी भी शुरू हो गई है। बड़े बाजारों से लेकर फुटपाथ तक की श्रृंगार की दुकानों पर महिलाओं की भीड़ देखने को मिल रही है। ब्यूटी पार्लरों में भी बुकिंग शुरू हो गई है। महिला सोलह श्रृंगार कर सुहाग की लंबी उम्र के लिए पूजा करेंगी।

पुरोहित संतोष त्रिपाठी ने बताया कि वट सावित्री की पूजा से सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद मिलता है। प्रत्येक सुहागन महिलाओं को यह व्रत अवश्य करनी चाहिए। पंचांग के अनुसार, इस साल ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 5 जून शाम 7 बजकर 54 मिनट पर शुरू होगी, जिसका समापन 6 जून शाम 6 बजकर 7 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार इस बार वट सावित्री व्रत 6 जून गुरुवार को रखा जाएगा।  पूजा के लिए शुभ मुहूर्त प्रातः 11 बजकर 52 मिनट से दोपहर 12 बजकर 48 मिनट तक है।

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इस तरह करें पूजा

पंडित जी ने पूजा करने की विधि को लेकर बताया कि सबसे पहले पूजा के दिन टोकरी में रेत भरकर ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित करें तथा वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। दूसरी टोकरी में सत्यवान सावित्री की मूर्ति स्थापित करें। दोनों टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे रखें। सबसे पहले ब्रह्मा-सावित्री की पूजा करें फिर सत्यवान और सावित्री की पूजा करें।  इसके बाद वट वृक्ष को पानी दें। जल, फूल, मोली, रोली, कच्चा सूत, चना, गुड़ तथा धूप-दीप से पूजा करें। जल चढ़ाकर वृक्ष के चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करें। वट के पत्तों की माला पहन कर कथा का श्रवण करें।