अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पाने से ज्यादा सुख देने में है

मनीष बैंक में एक सरकारी अफसर था। रोज बाइक से ऑफिस जाता और शाम को घर लौट के आता। शहर में चकाचौंध तो बहुत रहती है लेकिन जीवन कहीं सिकुड़ सा गया है, आत्मीयता की भावना तो जैसे किसी में है ही नहीं बस हर इंसान व्यस्त है, खुद की जिंदगी में। यही सोचता हुआ मनीष घर ऑफिस से घर की ओर जा रहा था। फुटपाथ पे एक छोटी सी डलिया लिए एक बूढ़ी औरत बैठी थी, शायद कुछ बेच रही थी। मनीष पास गया तो देखा कि छोटी सी डलिया में वो बूढ़ी औरत संतरे बेच रही थी। देखो कैसा जमाना है लोग मॉल जाकर महंगा सामान खरीदना पसंद करते हैं, कोई इस बेचारी की तरफ देख भी नहीं रहा, मनीष मन ही मन ये बात सोच रहा था।

बाइक रोककर मनीष बुढ़िया के पास गया, बोला-अम्मा एक किलो संतरे दे दो। बुढ़िया की आंखों में उसे देखकर एक चमक सी आई और तेजी से वो संतरे तौलने लगी। पैसे देकर मनीष ने थैली से एक संतरा निकाला और खाते हुए बोला अम्मा संतरे मीठे नहीं हैं और यह कहकर वो एक संतरा उस बुढ़िया को दे गया। वो संतरा चखकर बोली, मीठा तो है बाबू। मनीष बिना कुछ बोले थैली उठाये चलता बना।

अब ये रोज का क्रम हो गया, मनीष रोज उस बुढ़िया से संतरे खरीदता और थैली से एक संतरा निकालकर खाता और बोलता- अम्मा संतरे मीठे नहीं हैं, और कहकर बचा संतरा अम्मा को देता, बूढ़ी महिला संतरा खाकर बोलती- मीठा तो है बाबू। बस फिर वह थैली लेकर चला जाता।
कई बार मनीष की बीवी भी उसके साथ होती थी वो ये सब देखकर बड़ा आश्चर्यचकित होती थी। एक दिन उसने मनीष से कहा- सुनो जी, ये सारे संतरे रोज इतने अच्छे और मीठे होते हैं, फिर भी तुम क्यों रोज उस बेचारी के संतरों की बुराई करते हो।

मनीष हल्की मुस्कान के साथ बोला-उस बूढ़ी मां के सारे संतरे मीठे ही होते हैं लेकिन वो बेचारी कभी खुद उन संतरों को नहीं खाती। मैं तो बस ऐसा इसलिए करता हूं कि वो मेरे संतरों में से एक खाले और उसका नुकसान भी न हो। उनके रोज का यही क्रम पास ही सब्जी बेचने वाली भी देखती थी। एक दिन वो बूढ़ी अम्मा से बोली- ये लड़का रोज संतरा खरीदने में कितना चिकचिक करता है। रोज तुझे परेशान करता है, फिर भी मैं देखती हूं कि तू उसको एक संतरा फालतू तौलती है, क्यों ?

बूढ़ी बोली- बहन, वो लड़का मेरे संतरों की बुराई नहीं करता बल्कि मुझे रोज एक संतरा खिलाता है और उसको लगता है कि जैसे मुझे पता ही नहीं है लेकिन उसका प्यार देखकर खुद ही एक संतरा उसकी थैली में फालतू चला जाता है।

शिक्षा : विश्वास कीजिये, कभी-कभी ऐसी छोटी-छोटी बातों में बहुत आनंद भरा होता है। खुशियां पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं, दूसरों के प्रति प्रेम और आदर की भावना जीवन में मिठास घोल देती हैं।

 

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:To give more happiness than getting