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30 दिसंबर, 2020|5:22|IST

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खरमास से जुड़ी है सूर्यदेव की यह कथा, सूर्यदेव की पूजा से मिलता है खास फल

खरमास को पौष मास भी कहते हैं। इस महीने में दान-तप आदि किया जाता है। जब सूर्य देव गुरु की राशि धनु या मीन में विराजमान रहते हैं, उस समय को खरमास कहा जाता है। इस महीने दिसंबर में 14 तारीख से खरमास शुरू हो रहे हैं। पौष माह में कल्पवास का विधान किया गया है। कल्पवास का अर्थ है कि संगम के तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान तथा साधना करना। इसके बाद मकर संक्रांति के दिन संगम में स्नान किया जाता है। पौष खरमास का मास है, जिसमें किसी भी तरह के मांगलिक कार्य, विवाह, यज्ञोपवित या फिर किसी भी तरह के संस्कार नहीं किए जाते हैं। तीर्थ स्थल की यात्रा करने के लिए खरमास सबसे उत्तम मास माना गया है। आइए क्यों आते हैं खरमास और क्या है भगवान सूर्य से जुड़ी इसकी कथा: 
खरमास होने के पीछे एक कथा प्रचलित :

इस कथा के अनुसार सूर्यदेव अपने सात घोड़ों के रथ में भ्रमण कर रहे थे। घूमते घूमते अचानक उनके घोड़े प्यास से व्याकुल हो उठे। रास्ते में उन्हें एक तालाब दिखाई दिया। सूर्यदेव ने अपने रथ को रोक दिया और घोड़ों को पानी पिलाने लगे। पानी पीने के बाद घोड़े थकान से भर गए, तभी सूर्यदेव को स्मरण हुआ कि सृष्टि के नियमानुसार उन्हें निरंतर ऊर्जावान होकर चलते रहने का आदेश है। 

इस बीच सूर्यदेव को तालाब के किनारे दो गधे दिखाई दिए। सूर्यदेव उन गधों को अपने रथ में जोतकर वहां से चल दिए। इस तरह सूर्यदेव इस पूरे माह मंद गति से गधों की सवारी से चलते रहे। इस समय उनका तेज भी कम हो गया। पुनः मकर राशि में प्रवेश करने के समय एक माह पश्चात वह अपने सातों घोड़ों पर सवार हुए।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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  • Web Title:This story of Surya dev is associated with Kharmas worship of Suryadev gets special fruit