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ज्ञात से मुक्त होकर होती है अज्ञात की अनुभूति

जब तक मन कष्टों, संघर्षों से भरा है, ज्ञात के बोझ से दबा है, तब तक यह एकाकी नहीं हो सकता। एकाकी होने का मतलब अकेलापन नहीं है, एकांत है। यह एकांत जब आपके भीतर आता है, तब आप अपने ज्ञात से मुक्त होने लगत

ज्ञात से मुक्त होकर होती है अज्ञात की अनुभूति
Anuradha Pandeyलाइव हिंदुस्तान टीम,नई दिल्लीTue, 14 Nov 2023 02:09 PM
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जब तक मन समय का, ज्ञात का परिणाम है, वह कभी उस अज्ञात को नहीं खोज सकता जो ईश्वर है, यथार्थ है या जो भी आप उसे कहें। इस बात के सत्य को देख लेना मन को अतीत से मुक्त कर देता है। अतीत से मुक्त हो जाने का झट से यह मतलब न लगा लें कि आपको अपने घर का रास्ता याद नहीं रहेगा। वह तो स्मृति लोप है।

अज्ञात की अनुभूति के लिए मन को स्वयं ही अज्ञात हो जाना होगा। अब तक मन ज्ञात का ही परिणाम रहा है। आप ज्ञात के संचय, अपनी सारी परेशानियों, आडंबरों, महत्वाकांक्षाओं, पीड़ाओं, पारितोषों और कुंठाओं के अलावा और क्या हैं? वह सब कुछ ज्ञात ही है और ज्ञात समय और स्थान के दायरे में ही होता है, तथा जब तक मन समय के, ज्ञात के क्षेत्र में कार्यरत है, वह अज्ञात कभी नहीं हो पाता। वह मात्र उसका अनुभव करता रह सकता है, जो इसका जाना हुआ है। देखिए, इसमें कुछ जटिल या रहस्यमय नहीं है। हमारे दैनिक जीवन के जो सुपरिचित तथ्य हैं, मैं उन्हीं का वर्णन कर रहा हूं। ज्ञात के बोझ में दबा हुआ मन अज्ञात को ढूंढ़ निकालने की खोज में लग जाता है। यह ऐसा कैसे कर सकता है? हम सब ईश्वर की बातें करते हैं। प्रत्येक धर्म में, प्रत्येक गिरजे और मंदिर में इस शब्द का प्रयोग होता है, पर इसका अर्थ-बिंब हमेशा ज्ञात का ही होता है। बहुत कम ऐसे होते हैं, जो सारे मंदिरों, गिरजों, पुस्तकों को छोड़ देते हैं, जो पार जाते हैं और खोज लेते हैं।

अभी मन समय का, ज्ञात का ही परिणाम है तथा जब ऐसा मन अन्वेषण आरंभ करता है, तो यह मात्र उसी का अन्वेषण कर पाता है, जिसका इसे पहले से ही अनुभव हो चुका है, जो कि ज्ञात है। अज्ञात का अन्वेषण करने के लिए मन को स्वयं को ज्ञात से, अतीत से मुक्त कर लेना होगा, और यह धीमे विश्लेषण द्वारा, कदम-दर-कदम अतीत को खोदते हुए, हर स्वप्न, हर प्रतिक्रिया की व्याख्या करते हुए नहीं होगा बल्कि इसके लिए आपको अभी इसी क्षण, जब आप यहां बैठे हुए हैं, आपको इस सबका सत्य पूरी तरह से देख लेना होगा। जब तक मन समय का, ज्ञात का परिणाम है, वह कभी उस अज्ञात को नहीं खोज सकता जो ईश्वर है, यथार्थ है या जो भी आप उसे कहें। इस बात के सत्य को देख लेना मन को अतीत से मुक्त कर देता है। अतीत से मुक्त हो जाने का झट से यह मतलब न लगा लें कि आपको अपने घर का रास्ता याद नहीं रहेगा। वह तो स्मृति लोप है। इसे इस तरह की बचकानी सोच के स्तर तक न लाइए। परंतु मन उसी क्षण मुक्त हो जाता है, जब वह देख लेता है कि ज्ञात के बोझ से लदे रह कर वह उस यथार्थ को, अज्ञात की उस असाधारण अवस्था को नहीं पा सकता है। जानकारी अनुभव है, अहं है, ‘स्व’ है, जो इकट्ठा करता रहा है, जमा करता रहा है; अतएव समस्त ज्ञान को स्थगित होना होगा, समस्त अनुभव को छोड़ना पड़ेगा। और जब उस मुक्ति का मौन होता है, तब क्या मन स्वयं में ही शाश्वत नहीं है? तब इसे कुछ सर्वथा नूतन की अनुभूति हो रही होती है, जो यथार्थ है; पर उस अनुभूति के लिए मन को वही हो जाना होता है। यह मत कहने लगिए कि मन ही यथार्थ होता है; ऐसा नहीं है। मन को यथार्थ की अनुभूति तभी हो पाती है, जब यह समय से पूर्णतया मुक्त होता है।

अन्वेषण की यह संपूर्ण प्रक्रिया ही धर्म है। निश्चित रूप से, धर्म वह नहीं है, जिसमें आप विश्वास करते हैं; इसका इससे कुछ लेना-देना नहीं है कि आप ईसाई हैं, बौद्ध हैं, मुसलमान हैं अथवा हिंदू हैं; इन बातों का कोई महत्व नहीं है, ये तो बाधा हैं। अन्वेषण करने वाले मन को तो इन सबसे छुटकारा पाना होगा। नवीन होने के लिए मन को एकाकी होना होगा; शाश्वत सृजन की विद्यमानता के लिए, उसे ग्रहण करने हेतु मन का स्वयं उसी अवस्था में होना आवश्यक है। किंतु जब तक मन अपने कष्टों व संघर्षों से भरा है, जब तक यह ज्ञान के भार से बोझिल है तथा मनोवैज्ञानिक अवरोधों से जटिल बना है, तब तक मन कभी भी ग्रहण करने, समझने और अन्वेषण करने के लिए मुक्त नहीं हो पाता है।

एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति वह नहीं है, जिस पर विश्वासों, रूढ़ियों, कर्मकांडों की कठोर परतें चढ़ी हैं। सच्चे धार्मिक व्यक्ति के पास विश्वास नहीं होता है, वह किसी अनुभव का संचय न करते हुए पल-प्रति-पल जी रहा होता है, अतएव वही एकमात्र क्रांतिकारी है। सत्य समय में निरंतरता नहीं है, इसे हर क्षण नया पाना होता है। वह मन जो किसी भी अनुभव को जोड़ता है, पकड़ता है, संजोए रहता है, क्षण-क्षण नूतन का अन्वेषण करते हुए नहीं जी सकता है।

जो वास्तव में गंभीर हैं, जो महज शौकिया तौर पर इस सबसे खिलवाड़ में नहीं लगे हैं। वे जीवन में असाधारण महत्व रखते हैं, क्योंकि वे ही स्वयं और अन्यों के लिए भी प्रकाश पुंज बन सकेंगे। बिना अनुभव के, बिना उस मन के जो पूर्णत मुक्त है और इसलिए अज्ञात के प्रति अवरोधरहित, खुला है। ईश्वर की बात करने का कुछ भी मूल्य नहीं है। यह ऐसे ही है, जैसे बड़ी उमर के लोग खिलौनों से खेल रहे हों; और जब हम खिलौनों से खेलते हैं और उसी को ‘धर्म’ कहते हैं, तब हम अधिक विभ्रम, अधिकाधिक दुर्दशा निर्मित करते चले जाते हैं। मात्र उस स्थिति में ही, जब मन विचार करने की समस्त प्रक्रिया को समझ लेता है। जब हम अपने ही विचार में नहीं जकड़े होते, तभी मन के लिए निश्चल होना संभव होता है; केवल तब, शाश्वत का आविर्भाव होता है।

 

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