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28 अक्तूबर, 2020|8:41|IST

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Success Mantra : अपने साथ संवारी दूसरों की किस्मत, पढ़ें यह मोटिवेशनल कहानी

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अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता है। अपने सपने के साथ अपनी शक्ति का तालमेल बनाने से ही सही राह मिल सकती है। एनआईटी कुरुक्षेत्र से इंजीनियरिंग में स्नातक पूर्णिमा सिंह कॉरपोरेट क्षेत्र में जॉब करती थीं। लेकिन तीन साल तक जॉब करने के बाद उन्होंने शिल्प का व्यवसाय करने का फैसला किया और जॉब छोड़कर इस काम में लग गईं। इसमें उन्हें अपने पति चिन्मय बांठिया का भी पूरा सहयोग हासिल हुआ। चिन्मय भी अपना जमा-जमाया कॉरपोरेट जॉब छोड़कर पूर्णिमा के साथ शिल्प व्यवसाय में लग गए।

मेक इन इंडिया की प्रेरणा : पूर्णिमा को शिल्प व्यवसाय करने की प्रेरणा ‘मेक इन इंडिया' के महत्वाकांक्षी सपने से मिली, जिसके बाद उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर ‘शुभम् क्राफ्ट्स' की स्थापना की। इसमें शुरुआत में उन्होंने पांच लाख रुपये का निवेश किया। वह किस हद तक सफल रहीं, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अब उनका व्यवसाय करोड़ का आंकड़ा छूने को तैयार हो चुका है।

ग्रामीण महिलाओं को मौका : पूर्णिमा ने अपना ध्यान ग्रामीण महिलाओं पर केंद्रित किया और उनसे कागज की लुगदी से पात्र और सजावटी चीजें (पेपरमैशी) तथा पराली से टोकरियां बनवाईं। इस तरह उन्होंने उन अकुशल महिलाओं को न केवल शिल्प कार्य में निपुण होने का मौका दिया, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनने में भी मदद की। पूर्णिमा शुरू से ही यह सोचती रही थीं कि उन्हें कुछ ऐसा करना है, जो समाज के कमजोर तबके के लोगों को सशक्त बनाने में मददगार साबित हो। *शुभम् क्राफ्ट्स के रूप में उनकी यह सोच साकार हुई। पूर्णिमा ने अपना शिल्प व्यवसाय तीन ग्रामीण महिलाओं को लेकर शुरू किया था। आज उनकी टीम में करीब 35 ग्रामीण महिलाएं हैं, जो पेपरमैशी की कला में कुशल हैं।

हस्तशिल्प को प्रतिष्ठा : पूर्णिमा का व्यवसाय हस्तशिल्प को भी नए सिरे से प्रतिष्ठित करने में सहयोगी साबित हुआ है। शिल्प-व्यवसाय शुरू करते समय सबसे पहले उन्होंने पेपरमैशी का शिल्प चुना और कुछ ग्रामीण महिलाओं को इसका प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के बाद उन महिलाओं को शिल्प निर्माण की टीम में रखा गया। पेपरमैशी के साथ-साथ शुभम् क्राफ्ट्स पराली की टोकरियां, टेराकोटा, पत्थरों से बने शिल्प आदि का व्यवसाय भी करता है।

 

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पर्यावरण के अनुकूल : पूर्णिमा के व्यवसाय का एक उल्लेखनीय पक्ष पर्यावरण के अनुकूल होना भी है, क्योंकि इसके उत्पादों को प्लास्टिक के विकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है। वास्तव में उनके शिल्प उत्पादन में बड़े पैमाने पर कचरे का उपयोग किया जाता है। मसलन टोकरियां बनाने के लिए उनकी टीम पराली का इस्तेमाल करती है, जिनको जलाए जाने से प्रदूषण की बड़ी समस्या होती है।

वैश्विक दायरे में पहुंच : पूर्णिमा के शिल्प उत्पादों को वैश्विक स्तर पर पसंद किया गया है। यूरोप और अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के लोगों ने भी इनके उत्पाद खरीदे हैं।

निरंतर बढ़ती कामयाबी : पूर्णिमा का व्यवसाय लगातार आगे बढ़ रहा है। अपने उत्पादों में नयापन बनाए रखने के लिए वह हमेशा इनमें शैलीगत बदलाव करती हैं। अब उनकी योजना अपनी टीम को और बड़ा बनाने की है। जाहिर है, उनके व्यवसाय का विस्तार उनके साथ-साथ अनेक ग्रामीण महिलाओं के लिए भी संभावनाओं के नए रास्ते खोलेगा।

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  • Web Title:Success Mantra this girl motivational story will give you real meaning of life