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पंचांग-पुराणसक्सेस मंत्र: भले ही आपका ख्वाब पूरा न हो, लेकिन याद रखो मेहनत कभी बेकार नहीं जाती

हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीPublished By: Pankaj Vijay
Wed, 07 Apr 2021 11:25 PM
सक्सेस मंत्र: भले ही आपका ख्वाब पूरा न हो, लेकिन याद रखो मेहनत कभी बेकार नहीं जाती

कई बार ऐसा होता है कि कड़ी मेहनत के बाद आपको मंजिल नहीं मिल पाती। आपके सपनें टूट जाते हैं। लेकिन याद रखो कि जीवन में ईमानदारी से की मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। अगर आपका इरादा मजबूत है तो आप अपने ख्वाबों को हकीकत में बदलने का दूसरा दरवाजा जरूर ढूंढ लेंगे। आपकी मेहनत जीवन में आपके कभी न कभी काम आती रहेगी। यहां पढ़ें ऐसी ही सफलता की एक अच्छी कहानी- 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिनों पहले अपने मन की बात कार्यक्रम में ‘नायक सर’ को सराहा, तो पूरे देश में सिलू नायक मशहूर हो गए। सैकड़ों नौजवानों और उनके हजारों परिजनों की निगाह में सम्मान तो वह पहले ही कमा चुके थे। ओडिशा के अराखुड़ा में पैदा सिलू नायक की बचपन से ही हसरत थी कि वह वरदी पहन मातृभूमि की सेवा करें और अपने समाज के काम आएं। देश के लोगों में सैनिकों के प्रति जो सम्मान-भाव है, वह नायक को प्रेरित करता रहा और वह उस सेवा में जाने के लिए खुद को शारीरिक-मानसिक रूप से तैयार करने में जुट गए। साल 2016 में वह वक्त भी आया, जिसका उन्हें वर्षों से इंतजार था। गांव में ही ओडिशा पुलिस का भर्ती-शिविर लगने वाला था। नायक के लिए यह सुनहरा मौका था। वह अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। उन्होंने चयन प्रक्रिया से जुड़ी सारी शारीरिक गतिविधियां भी बढ़ा दीं। मगर सबको अपना मनचाहा कहां मिलता है? एक सेंटीमीटर के फासले ने नायक से वर्षों के सपने छीन लिए। उनकी ऊंचाई 168 सेंटीमीटर थी, जबकि चयन की कसौटी 169 सेंटीमीटर की थी। नायक भर्ती के अयोग्य करार दिए गए। हालांकि, उन्हें ओडिशा इंडस्ट्रीयल सिक्युरिटी फोर्सेज (ओआईएसएफ) में नौकरी का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन 7,200 रुपये मासिक पगार में वह अपनी और समाज की क्या भलाई कर पाते, इसलिए उन्होंने विनम्रतापूर्वक उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।  

पिछले पांच साल की कोशिश नाकाम हो गई थी। सारे सपने रेजा-रेजा बिखर गए थे। इस निराशा से उबरने में नायक को लगभग तीन महीने लग गए। मन स्थिर हुआ, तो सोचा कि मातृभूमि और समाज की सेवा के और भी तो रास्ते हैं, क्यों न अब उन पर गौर किया जाए। नायक को लगा कि इन वर्षों में जो कौशल उन्होंने सीखा है, उसके जरिए ही वह कुछ कर सकते हैं। फिर उन्होंने तय किया कि वह इलाके के उन लड़कों का मार्गदर्शन करेंगे, जो सेना या सुरक्षाबलों में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं। नायक ने गांव के कुछ लड़कों के साथ शुरुआत की। लेकिन जल्द ही उन्हें यह एहसास हो गया कि यह काम आसान नहीं है। गांव के ही कुछ विघ्न संतोषियों ने उनकी इस कोशिश को पैसे कमाने की मंशा से जोड़ना शुरू कर दिया। वे बच्चों को भड़काते कि नायक तुम लोगों से बाद में इसके पैसे वसूलेगा। कुछ लोग इसे संदिग्ध गतिविधि तक से जोड़ देते। नायक को दुख होता, क्योंकि वह तो अपनी देशभक्ति इन नौजवानों के जरिए जीना चाहते थे और समाज सेवा के तौर पर यह सब कर रहे थे। आज भी उनका न कोई एनजीओ है, न उन्होंने किसी सरकारी मदद के लिए आवेदन किया और न ही वह छात्रों से कुछ लेते हैं। बहरहाल, नायक  यह जानते थे कि उनके इरादों में कोई खोट नहीं है, तो दुष्प्रचार भी खुद-ब-खुद दम तोड़ देंगे। वह अपने मिशन में जुटे रहे। 

silu nayak

शुरू-शुरू में नौजवानों का भी भरोसा बहुत नहीं जमता था। चंद रोज में ही वे नायक का साथ छोड़ देते। उन्हें प्रेरित करने के लिए नायक को काफी मेहनत करनी पड़ी। वह छात्रों से यही कहते कि फर्क महसूस करने के लिए कम से कम 20 दिन की ट्रेनिंग तो लो। नायक की मेहनत रंग ले आई। गांव के जिन बच्चों के साथ उन्होंने यह नया सफर शुरू किया था, उनमें से चार का चयन रक्षा क्षेत्र के लिए हुआ। इसके साथ ही कटाक्ष और आलोचनाओं का गुबार बैठ गया। उनके पास पड़ोसी गांवों से भी बड़ी संख्या में युवा आने शुरू हो गए। जाहिर है, वे सब आर्थिक रूप से कमजोर घरों के बच्चे होते थे। उनमें जिंदगी को एक मकसद देने की तड़प तो थी, मगर उनके पास रास्ता दिखाने वाला कोई नायक न था। अक्सर वे हताशा में बिखर जाते और राह भटक जाते थे। अब सिलू नायक उनके पास थे। नायक इन युवकों को सिर्फ शारीरिक प्रशिक्षण नहीं देते थे, बल्कि जिन बच्चों को गणित और ‘करेंट अफेयर्स’ में परेशानी आती थी, उनकी आसानी के लिए इन्होंने एक पाठ्यक्रम तैयार किया। उनकी ट्रेनिंग का पहला सत्र सुबह 5.30 बजे से शुरू होता है, जो दो घंटे का होता है और यह शारीरिक प्रशिक्षण से जुड़ा हुआ है। शाम के सत्र में वह लिखित परीक्षा, इंटरव्यू और व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की बारीकियां समझाते हैं। उम्र के 29वें पड़ाव पर खडे़ नायक ने अब तक 300 से अधिक बच्चों को प्रशिक्षण दिया और उनमें से 70 कामयाब भी हो चुके हैं। करीब 20 तो देश की सर्वोच्च सेनाओं- थल सेना, वायु सेना और नौसेना- के लिए चयनित हुए हैं, तो बाकी बीएसएफ, सीआरपीएफ व अन्य अद्र्र्ध सैन्य बलों में चुने गए हैं। सिलू नायक का घर पिता की खेती और खुद की पार्ट टाइम ड्राइवरी से चलता है। उन्हें अब कोई मलाल नहीं कि वह स्वयं चुने न जा सके। उन्होंने मातृभूमि की सेवा के लिए कई नायक दे दिए हैं। देश गदगद है ऐसे सपूत पर, तभी तो प्रधानमंत्री ने कहा- ‘आइए, हम सब मिलकर नायक सर को शुभकामना दें कि वह देश के लिए और अधिक नायकों को तैयार करें।’

प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

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