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सीता नवमी पर मंदिरों में होगी विशेष पूजा-अर्चना

भगवान श्रीराम की पत्नी और त्रेतायुग में रावण के वध का कारण बनीं माता सीता का जन्मदिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस बार 13 मई सोमवार को मंदिरों में श्रीराम के साथ स्थापित माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना होगी। मंदिरों में श्रीराम व सीता की मूर्तियों को विशेष रूप से सजाया गया है।

मुजफ्फरनगर के शुकतीर्थ स्थित ब्रह्मविद्या पीठ के संस्थापक दंडी स्वामी महादेवाश्रम जी महाराज के अनुसार माता सीता का जीवन चरित्र भारतीय नारियों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय हैं।

सीता नवमी की पूर्व संध्या पर श्रीबालाजी मंदिर भरतिया कालोनी, संकीर्तन भवन नईमंडी, श्रीराम मंदिर कंबलवाला बाग समेत सभी मंदिरों में श्रीराम व सीता जी की मूर्तियों का विशेष श्रृंगार किया गया है।

सीताजी के जन्म के बारे में दंडी स्वामी महादेव आश्रम जी महाराज ने बताया कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को जब राजा जनक ने मिथिला में बारिश की कामना से जमीन को हल से जोता तो उस समय सीता जी जमीन से प्रकट हुई थी। राजा जनक ने उन्हें पुत्री के रूप में अपना लिया जिस कारण वह जनक पुत्री कहलाईं।

सीता जी को त्रेतायुग में लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। भगवान शिव का धनुष तोड़कर विष्णुजी के अवतार श्रीराम ने स्वयंवर में सीता का वरण किया था। उन्होंने कहा कि सीता जी पतिव्रता नारी का प्रतीक हैं। वह महलों का वैभव छोड़कर पति श्रीराम के साथ वनवास में गई।

वह अशोक वाटिका में रावण से बात करते हुए तिनके की ओट का सहारा लेती थी। उन्होंने कहा कि रावण वध के बाद जब श्रीराम ने राज्याभिषेक होने के बाद लोगों के सवाल उठाने पर सीताजी का परित्याग कर दिया था तो उस समय भी उनके मन में कभी कोई द्वेषभाव नही आया।

महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में रहते हुए उन्होंने अपने दोनों पुत्रों लव और कुश को संस्कार दिए और उन्हें योग्य बनाया। उन्होंने कहा कि मंदिरों में श्रीराम के साथ सीता जी की मूर्ति स्थापित हैं, उनकी सीता नवमी पर विशेष पूजा अर्चना करना काफी पुण्यकारी होगा।

 

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